श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 24
अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha .
sarvathā vartamāno.api na sa bhūyo.abhijāyate ॥
अर्थ
जो मनुष्य इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को तत्त्व से जानता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता
शब्दार्थ
- यः – जो
- एवम् – इस प्रकार
- वेत्ति – जानता है
- पुरुषम् – पुरुष को
- प्रकृतिम् – प्रकृति को
- च – और
- गुणैः सह – गुणों के सहित
- सर्वथा – सब प्रकार से
- वर्तमानः – बरतता हुआ, जीवन व्यवहार करता हुआ
- अपि – भी
- न – नहीं
- सः – वह
- भूयः – फिर से
- अभिजायते – जन्म लेता है
अन्वय
यः एवम् पुरुषम् गुणैः सह प्रकृतिम् च वेत्ति, सः सर्वथा वर्तमानः अपि भूयः न अभिजायते ।
व्याख्या
यह श्लोक प्रकृति-पुरुष के विवेक का फल बताता है। ‘एवम्’ — इस प्रकार — का संकेत पिछले चार श्लोकों की ओर है: प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, कर्म प्रकृति का है, भोग गुणसङ्ग से होता है, और इस शरीर में परम पुरुष साक्षी रूप से विराजमान है। जो इस सत्य को केवल सुनता नहीं, बल्कि अनुभव से ‘जानता’ है, वह फिर जन्म नहीं लेता।
‘सर्वथा वर्तमानोऽपि’ — सब प्रकार से बरतता हुआ भी — यह वाक्यांश बहुत ध्यान देने योग्य है। ज्ञानी को संसार छोड़कर भागना नहीं पड़ता। वह गृहस्थ हो, राजा हो, योद्धा हो — जैसे अर्जुन को युद्ध करना है — फिर भी यदि वह भीतर से जानता है कि क्रियाएँ प्रकृति कर रही है और मैं साक्षी हूँ, तो उसके कर्म बन्धन नहीं बनते। चौथे अध्याय (4.37) में कहा गया था कि ज्ञानाग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।
शंकराचार्य इसका अर्थ करते हैं कि ज्ञानी चाहे विधिसम्मत आचरण करे या प्रारब्धवश किसी भी स्थिति में हो, आत्मज्ञान के कारण उसके संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं और नए कर्म उसे नहीं बाँधते; प्रारब्ध भोगकर शरीर छूटते ही वह मुक्त हो जाता है। रामानुजाचार्य इसे इस रूप में देखते हैं कि जो प्रकृति से भिन्न आत्मा का स्वरूप और प्रकृति के गुणों की प्रकृति जान लेता है, वह किसी भी दशा में रहे, देहान्त के बाद प्रकृति से फिर नहीं बँधता। पर वे ‘सर्वथा’ को अनुचित आचरण की छूट नहीं मानते; ज्ञान का स्वाभाविक फल ही शुद्ध आचरण है।
यही बात सब आचार्यों के लिए समान है: सच्चा ज्ञान जीवन को भीतर से बदल देता है। जो वास्तव में जानता है, उसके लिए अधर्म की ओर खिंचाव स्वयं समाप्त हो जाता है।
प्रसंग
श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। पिछले श्लोक (13.23) में शरीर में स्थित परमात्मा का वर्णन था। यह श्लोक इस विवेक-ज्ञान का फल बताता है, और अगले दो श्लोकों (13.25–26) में इस आत्मदर्शन तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग बताए गए हैं।
जीवन-शिक्षा
मुक्ति के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं, अपनी पहचान बदलना आवश्यक है। जो भीतर से साक्षी बनकर कर्म करता है, वह भीड़ में रहकर भी स्वतन्त्र है। सच्चा ज्ञान हमारे आचरण को अपने आप शुद्ध कर देता है।
मुख्य शब्द
- वेत्ति
- जानता है — अनुभव से, केवल पढ़कर नहीं
- सर्वथा वर्तमान
- सब परिस्थितियों में जीवन व्यवहार करता हुआ
- पुनर्जन्म
- बार-बार जन्म लेना; यहाँ उससे मुक्ति का कथन है
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 13.19 – इति क्षेत्रं तथा
- गीता 13.20 – प्रकृतिं पुरुषं चैव
- गीता 13.21 – कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते
- गीता 13.22 – पुरुषः प्रकृतिस्थो हि
- गीता 13.23 – उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता
- गीता 13.25 – ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना
- गीता 13.26 – अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य
- गीता 13.27 – यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्
- गीता 13.28 – समं सर्वेषु भूतेषु
- गीता 13.29 – समं पश्यन्हि सर्वत्र