भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 32

अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ .
śarīrastho.api kaunteya na karoti na lipyate ॥

अर्थ

हे कौन्तेय! अनादि और निर्गुण होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होते हुए भी न कुछ करता है और न किसी कर्म से लिप्त होता है

शब्दार्थ

  • अनादित्वात् – अनादि होने के कारण
  • निर्गुणत्वात् – गुणों से रहित होने के कारण
  • परमात्मा – परम आत्मा
  • अयम् – यह
  • अव्ययः – अविनाशी, विकार-रहित
  • शरीरस्थः – शरीर में स्थित
  • अपि – भी
  • कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र अर्जुन
  • न – नहीं
  • करोति – करता है
  • न – नहीं
  • लिप्यते – लिप्त होता है

अन्वय

कौन्तेय, अयम् अव्ययः परमात्मा अनादित्वात् निर्गुणत्वात् (च) शरीरस्थः अपि न करोति, न लिप्यते ।

व्याख्या

श्लोक 30 में कहा गया था कि आत्मा अकर्ता है। अब भगवान उसका कारण बताते हैं — परमात्मा अनादि है और निर्गुण है, इसलिए अव्यय है। जिसका आरंभ होता है, उसका अंत भी होता है; जो अनादि है, वह अनंत भी है। जिसमें गुण होते हैं, उसमें परिवर्तन होता है, क्योंकि गुण ही बदलते रहते हैं; जो निर्गुण है, उसमें कोई विकार संभव नहीं। इसलिए वह ‘अव्यय’ है — न घटता है, न बदलता है।

कर्म करना एक प्रकार का परिवर्तन है, और कर्म-फल से लिप्त होना उस परिवर्तन का परिणाम है। जो सर्वथा अविकारी है, वह न कर्म करता है, न उसके फल से बँधता है। शरीर में रहते हुए भी वह शरीर के धर्मों — जन्म, वृद्धि, रोग, जरा, मृत्यु — से अछूता रहता है। देह के सुख-दुख, पाप-पुण्य उसे छू नहीं पाते।

शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि शरीर में रहना भी केवल उपाधि-दृष्टि से कहा गया है; जैसे सूर्य का प्रतिबिंब जल में दिखता है पर सूर्य जल नहीं होता, वैसे ही आत्मा देह में ‘स्थित’ प्रतीत होता है पर देह से बँधता नहीं। रामानुजाचार्य यहाँ ‘परमात्मा’ शब्द को देह से श्रेष्ठ जीवात्मा के अर्थ में भी पढ़ते हैं, जो अपने स्वरूप में अनादि और प्राकृत गुणों से रहित है; देह के कर्म उसके स्वरूप को नहीं बदलते। मध्वाचार्य इसे सबके भीतर रहने वाले परमेश्वर का वर्णन मानते हैं, जो जीव के साथ रहकर भी उसके कर्मों से लिप्त नहीं होता।

दूसरे अध्याय (2.20-24) का संदेश — आत्मा न जन्मता है न मरता है, उसे न शस्त्र काटते हैं न अग्नि जलाती है — यहाँ पुनः दार्शनिक आधार के साथ दोहराया गया है।

प्रसंग

श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा के अकर्तापन का दार्शनिक आधार समझा रहे हैं। श्लोक 31 में सब भूतों को एक परमात्मा में देखने की बात कही गई; अब उस परमात्मा की निर्लिप्तता बताई जा रही है। अगले श्लोक में आकाश के दृष्टांत से यही बात और स्पष्ट की जाएगी।

जीवन-शिक्षा

हमारे भीतर एक ऐसा केंद्र है जिसे न कोई अपमान घटा सकता है, न कोई सफलता बढ़ा सकती है। उसी को अपना वास्तविक स्वरूप जानकर हम परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव में भी शांत और निर्भय रह सकते हैं।

मुख्य शब्द

अनादि
जिसका कोई आरंभ नहीं
निर्गुण
सत्त्व, रज, तम — प्रकृति के गुणों से परे
अव्यय
अविनाशी, जिसमें कोई क्षय या विकार नहीं
न लिप्यते
कर्म और उसके फल से अछूता रहना

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक