भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 30

अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ .
yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati ॥

अर्थ

जो मनुष्य सब कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हुए देखता है, और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही वास्तव में देखता है

शब्दार्थ

  • प्रकृत्या – प्रकृति के द्वारा
  • एव – ही
  • च – और
  • कर्माणि – कर्म
  • क्रियमाणानि – किए जाते हुए
  • सर्वशः – सब प्रकार से
  • यः – जो
  • पश्यति – देखता है
  • तथा – और उसी प्रकार
  • आत्मानम् – आत्मा को
  • अकर्तारम् – अकर्ता, कर्म न करने वाला
  • सः – वह
  • पश्यति – (यथार्थ) देखता है

अन्वय

यः च कर्माणि सर्वशः प्रकृत्या एव क्रियमाणानि, तथा आत्मानम् अकर्तारं पश्यति, सः पश्यति ।

व्याख्या

श्लोक 28 में सच्चे दर्शन का एक पक्ष बताया गया था — नश्वर में अविनाशी को देखना। अब दूसरा पक्ष बताया जा रहा है — कर्म और कर्तापन का सही विवेक। देखना, सुनना, चलना, सोचना, निर्णय करना — ये सब क्रियाएँ प्रकृति के कार्य, अर्थात शरीर, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा होती हैं। आत्मा इन सबका साक्षी है, कर्ता नहीं। इसी अध्याय के श्लोक 21 में कहा गया कि कार्य-कारण के कर्तृत्व में प्रकृति हेतु है।

तीसरे अध्याय (3.27) में भगवान ने कहा था कि सब कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, परंतु अहंकार से मोहित व्यक्ति ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है। पाँचवें अध्याय (5.8-9) में तत्त्वज्ञ कहता है ‘मैं कुछ भी नहीं करता’ — इंद्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं। यह श्लोक उसी ज्ञान का सार है।

यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। आत्मा को अकर्ता जानना आलस्य या दायित्व से भागने का बहाना नहीं है। गीता का पूरा संदेश कर्म करने का है; अंतर केवल इतना है कि ज्ञानी कर्म करते हुए भी कर्तापन के अहंकार और फल की आसक्ति से मुक्त रहता है। इसी से कर्म बंधन नहीं बनता।

शंकराचार्य के अनुसार आत्मा निर्विकार और निष्क्रिय है; कर्तृत्व अविद्या से उस पर आरोपित है। रामानुजाचार्य यहाँ प्रकृति से संयुक्त जीव के कर्मों का कारण गुणों को मानते हैं, और आत्मा को स्वरूपतः कर्म-बंधन से अलग बताते हैं। मध्वाचार्य स्मरण कराते हैं कि जीव का कर्तृत्व भी ईश्वर के अधीन है, स्वतंत्र नहीं।

प्रसंग

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विवेक को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि क्रिया क्षेत्र (प्रकृति) की है, क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की नहीं। श्लोक 28-29 में समदर्शन का फल बताया गया; अगले श्लोक में भगवान बताएँगे कि सब भूतों को एक परमात्मा में स्थित देखने पर मनुष्य ब्रह्म हो जाता है।

जीवन-शिक्षा

जब हम समझते हैं कि शरीर, मन और परिस्थितियाँ मिलकर कर्म करते हैं, तो ‘मैंने किया’ का अहंकार और ‘मुझसे गलत हुआ’ का अतिरिक्त बोझ दोनों हल्के हो जाते हैं। पूरी निष्ठा से कर्म करें, पर स्वयं को उनका साक्षी जानें।

मुख्य शब्द

प्रकृति
त्रिगुणमयी मूल शक्ति, जिससे शरीर, इंद्रियाँ और मन बने हैं
अकर्ता
जो वास्तव में कर्म नहीं करता, साक्षी आत्मा
कर्तृत्वाभिमान
‘मैं कर्ता हूँ’ यह अहंकार

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