भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 44

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन

संस्कृत श्लोक

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम (or नरकेऽनियतं) ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana .
narake niyataṃ vāso bhavatītyanuśuśruma ॥

अर्थ

हे जनार्दन! हमने परम्परा से सुना है कि जिन मनुष्यों के कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, उनका दीर्घकाल तक नरक में निवास होता है

शब्दार्थ

  • उत्सन्नकुलधर्माणाम् – जिनके कुल-धर्म नष्ट हो गए हैं
  • मनुष्याणाम् – मनुष्यों का
  • जनार्दन – हे जनार्दन
  • नरके – नरक में
  • नियतम् – निश्चित रूप से, दीर्घकाल तक
  • वासः – निवास
  • भवति – होता है
  • इति – ऐसा
  • अनुशुश्रुम – हमने (परम्परा से) सुना है

अन्वय

जनार्दन, उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां नरके नियतं वासः भवति इति अनुशुश्रुम ।

व्याख्या

यह कुल-नाश के परिणामों की श्रृंखला की अन्तिम कड़ी है। अर्जुन कहते हैं कि जिनके कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, वे नरक में निवास करते हैं। कुछ पाठों में 'नरकेऽनियतं' मिलता है, जिसका अर्थ है 'अनिश्चित काल तक' — दोनों ही पाठ दीर्घ दुःख की ओर संकेत करते हैं।

'अनुशुश्रुम' — हमने सुना है — यह शब्द महत्त्वपूर्ण है। अर्जुन यह बात अपने अनुभव से नहीं, शास्त्र और गुरु-परम्परा से सुनकर कह रहे हैं। इससे पता चलता है कि वे शास्त्रों का आदर करने वाले, संस्कारी व्यक्ति हैं। उनका विषाद अधर्म से नहीं, बल्कि धर्म की एक संकुचित समझ से उत्पन्न हुआ है।

परन्तु यहाँ अर्जुन की एक बड़ी भूल है। वे शास्त्र के एक अंश को उसके सन्दर्भ से अलग करके लागू कर रहे हैं। शास्त्र कुल-धर्म के नाश को निन्दनीय कहता है, पर वही शास्त्र क्षत्रिय के लिए धर्म-युद्ध को सर्वोच्च कर्तव्य भी बताता है। जब धर्म के विभिन्न नियमों में विरोध दिखे, तब ऊँचे और व्यापक धर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए। अर्जुन यहाँ छोटे धर्म के लिए बड़े धर्म का त्याग कर रहे हैं।

श्लोक 38 से 44 तक अर्जुन के तर्क एक सुसंगत श्रृंखला बनाते हैं — कुल-नाश → कुल-धर्म का नाश → अधर्म का प्रसार → सामाजिक अव्यवस्था → पितरों का पतन → नरक। यह तर्क-श्रृंखला प्रभावशाली है, पर इसका आधार — कि यह धर्म-युद्ध 'पाप' है — ही गलत है।

प्रसंग

श्लोक 40-43 के तर्कों का यह अन्तिम निष्कर्ष है। अगले श्लोक में अर्जुन इस पूरे विश्लेषण के बाद गहरा पश्चात्ताप प्रकट करते हैं — 'हम कितना बड़ा पाप करने जा रहे थे!'

जीवन-शिक्षा

शास्त्र का कोई एक वचन उसके पूरे सन्दर्भ से अलग करके लागू करने से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। धर्म की सही समझ के लिए सम्पूर्ण दृष्टि और योग्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।

मुख्य शब्द

अनुशुश्रुम
हमने परम्परा से सुना है
नरक
पाप-कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली दुःखमय अवस्था
उत्सन्नकुलधर्म
जिसके कुल-धर्म नष्ट हो गए हों

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक