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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 40

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन

संस्कृत श्लोक

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ .
dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnamadharmo.abhibhavatyuta ॥

अर्थ

कुल का नाश होने पर सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल पर अधर्म छा जाता है

शब्दार्थ

  • कुलक्षये – कुल का नाश होने पर
  • प्रणश्यन्ति – नष्ट हो जाते हैं
  • कुलधर्माः – कुल की धार्मिक परम्पराएँ
  • सनातनाः – सनातन, परम्परा से चले आ रहे
  • धर्मे – धर्म के
  • नष्टे – नष्ट होने पर
  • कुलम् – कुल को
  • कृत्स्नम् – सम्पूर्ण
  • अधर्मः – अधर्म
  • अभिभवति – दबा लेता है, छा जाता है
  • उत – भी, निश्चय ही

अन्वय

कुलक्षये सनातनाः कुलधर्माः प्रणश्यन्ति; धर्मे नष्टे उत कृत्स्नं कुलम् अधर्मः अभिभवति ।

व्याख्या

अब अर्जुन कुल-नाश के परिणामों की एक श्रृंखला प्रस्तुत करते हैं, जो इस श्लोक से आरम्भ होकर श्लोक 44 तक चलती है। पहली कड़ी है — कुल के नाश से 'कुलधर्म' का नाश।

'कुलधर्म' का अर्थ है वे धार्मिक परम्पराएँ, संस्कार, आचार और कर्तव्य जो किसी कुल में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते आते हैं — जैसे यज्ञ, श्राद्ध, व्रत, उत्सव, नैतिक मूल्य और जीवन-पद्धति। इन परम्पराओं को जीवित रखने का दायित्व कुल के बड़े-बूढ़ों पर होता है, जो उन्हें अगली पीढ़ी को सौंपते हैं। युद्ध में जब कुल के अधिकांश वयस्क पुरुष मारे जाएँगे, तो इन परम्पराओं को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं बचेगा।

दूसरी कड़ी है — धर्म के नष्ट होने पर पूरे कुल में अधर्म फैल जाना। जब मार्गदर्शन करने वाले बुजुर्ग नहीं रहते और परम्पराएँ टूट जाती हैं, तो समाज में अनुशासन और नैतिकता की नींव कमज़ोर पड़ जाती है। तब मनमानी और अव्यवस्था बढ़ने लगती है।

अर्जुन का यह तर्क समाजशास्त्रीय दृष्टि से गहरा है और सामान्य परिस्थितियों में सत्य भी है — युद्ध केवल व्यक्तियों को नहीं मारता, संस्कृति और मूल्यों को भी मारता है। परन्तु विडम्बना यह है कि जिस अधर्म के फैलने का भय अर्जुन को है, वह दुर्योधन के शासन में पहले से फैल रहा है। अधर्म को रोकने के लिए ही यह युद्ध है। अर्जुन रोग के उपचार को ही रोग का कारण मान रहे हैं।

प्रसंग

श्लोक 38-39 में अर्जुन ने कुल-नाश के दोष का उल्लेख किया था; यहाँ से वे उसके क्रमिक परिणाम बताते हैं। अगले श्लोक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी — स्त्रियों का दूषित होना और वर्णसंकर — का वर्णन है।

जीवन-शिक्षा

परिवार और समाज की स्वस्थ परम्पराएँ पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी होती हैं; उन्हें सँजोना हम सबका दायित्व है। परन्तु परम्परा की रक्षा के नाम पर अधर्म को सहते रहना उचित नहीं।

मुख्य शब्द

कुलधर्म
कुल में परम्परा से चले आ रहे धार्मिक आचार, संस्कार और कर्तव्य
सनातन
प्राचीन काल से निरन्तर चला आ रहा
अधर्म
धर्म का अभाव; अनुचित और अनैतिक आचरण

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