श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 46
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yadi māmapratīkāramaśastraṃ śastrapāṇayaḥ .
dhārtarāṣṭrā raṇe hanyustanme kṣemataraṃ bhavet ॥
अर्थ
यदि मुझ शस्त्र-रहित और प्रतिकार न करने वाले को हाथ में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें, तो वह भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा
शब्दार्थ
- यदि – यदि
- माम् – मुझको
- अप्रतीकारम् – प्रतिकार न करने वाले को
- अशस्त्रम् – शस्त्र-रहित को
- शस्त्रपाणयः – हाथ में शस्त्र लिए हुए
- धार्तराष्ट्राः – धृतराष्ट्र के पुत्र
- रणे – युद्ध में
- हन्युः – मार डालें
- तत् – वह
- मे – मेरे लिए
- क्षेमतरम् – अधिक कल्याणकारी
- भवेत् – होगा
अन्वय
यदि शस्त्रपाणयः धार्तराष्ट्राः अप्रतीकारम् अशस्त्रं मां रणे हन्युः, तत् मे क्षेमतरं भवेत् ।
व्याख्या
यह अर्जुन के विषाद का चरम बिन्दु है और प्रथम अध्याय में उनका अन्तिम कथन। वे घोषणा करते हैं कि यदि कौरव उन्हें निहत्था और बिना प्रतिरोध के मार डालें, तो वह भी उनके लिए 'क्षेमतर' — अधिक कल्याणकारी — होगा। अर्जुन अब मारने की बजाय मरना पसन्द कर रहे हैं।
'क्षेमतर' शब्द ध्यान देने योग्य है। अर्जुन यहाँ अपनी सुरक्षा या कल्याण की बात कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि स्वजनों को मारकर जीवित रहने से अच्छा है स्वयं मर जाना, क्योंकि इससे वे पाप से बच जाएँगे। यह एक प्रकार का नैतिक आत्म-संरक्षण है — अपनी आत्मा को पाप के कलंक से बचाने का प्रयास।
ऊपर से यह अहिंसा और त्याग का उच्च आदर्श लगता है। परन्तु परम्परागत व्याख्याकार स्पष्ट करते हैं कि यह अहिंसा नहीं, बल्कि मोह-जनित पलायन है। सच्ची अहिंसा राग-द्वेष से मुक्त मन से उपजती है, न कि अपनों के प्रति आसक्ति से। और एक क्षत्रिय योद्धा, जिस पर लाखों लोगों के न्याय और सुरक्षा का दायित्व है, यदि रणभूमि में शस्त्र डाल दे, तो वह अधर्म को खुली छूट दे देगा। उसका 'त्याग' वास्तव में उन सबके साथ विश्वासघात होगा जो उस पर निर्भर हैं।
ध्यान दें कि अर्जुन यहाँ भी 'मे' — 'मेरे लिए' — कहते हैं। उनका पूरा तर्क अपने पाप-पुण्य, अपने सुख-दुःख के इर्द-गिर्द घूम रहा है। गीता का उपदेश उन्हें इसी 'मैं' और 'मेरा' से ऊपर उठाकर कर्तव्य की व्यापक भूमि पर ले जाएगा।
प्रसंग
पिछले श्लोक के पश्चात्ताप के बाद अर्जुन यहाँ अपना अन्तिम निर्णय सुनाते हैं। यह प्रथम अध्याय में अर्जुन का अन्तिम कथन है; अगले श्लोक में संजय बताते हैं कि अर्जुन धनुष-बाण त्यागकर रथ में बैठ गए।
जीवन-शिक्षा
कभी-कभी कठिन कर्तव्य से बचने के लिए मन 'त्याग' और 'अहिंसा' जैसे ऊँचे आदर्शों का सहारा लेता है। यह जाँचना आवश्यक है कि हमारा निर्णय सच्चे विवेक से उपजा है या केवल पीड़ा से बचने की इच्छा से।
मुख्य शब्द
- अप्रतीकार
- प्रतिरोध या बचाव न करने वाला
- अशस्त्र
- शस्त्र-रहित, निहत्था
- क्षेमतर
- अधिक कल्याणकारी, अधिक सुरक्षित