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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 29

अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

jarāmaraṇamokṣāya māmāśritya yatanti ye .
te brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṃ karma cākhilam ॥

अर्थ

जो लोग बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, संपूर्ण अध्यात्म को और समस्त कर्म को जान लेते हैं

शब्दार्थ

  • जरामरणमोक्षाय – बुढ़ापे और मृत्यु से छुटकारे के लिए
  • माम् – मेरा
  • आश्रित्य – आश्रय लेकर
  • यतन्ति – प्रयत्न करते हैं
  • ये – जो
  • ते – वे
  • ब्रह्म – ब्रह्म को
  • तत् – उस
  • विदुः – जानते हैं
  • कृत्स्नम् – संपूर्ण
  • अध्यात्मम् – अध्यात्म को, आत्मा-सम्बन्धी तत्त्व को
  • कर्म – कर्म को
  • च – और
  • अखिलम् – समस्त

अन्वय

ये जरामरणमोक्षाय माम् आश्रित्य यतन्ति, ते तत् ब्रह्म, कृत्स्नम् अध्यात्मम्, अखिलं कर्म च विदुः ।

व्याख्या

अध्याय के अंतिम दो श्लोकों में भगवान् अपने भक्तों को मिलने वाले पूर्ण ज्ञान का वर्णन करते हैं, और साथ ही कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रस्तुत करते हैं जिनकी व्याख्या आठवें अध्याय में होगी।

‘जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये’ — जो जरा (बुढ़ापा) और मरण से मुक्ति के लिए मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं। जीवन की सबसे गहरी पीड़ाएँ — बुढ़ापा, रोग, मृत्यु — शरीर से जुड़ी हैं। जो इनसे सचमुच मुक्त होना चाहता है, उसे शरीर से परे के सत्य की खोज करनी होती है। पर यह प्रयत्न केवल अपने बल पर नहीं, ‘मामाश्रित्य’ — भगवान् का आश्रय लेकर किया जाता है। यही 7.14 की शरणागति है।

ऐसे साधक तीन बातें पूर्ण रूप से जान लेते हैं। ‘तद् ब्रह्म’ — उस परम ब्रह्म को, जो सबका मूल है। ‘कृत्स्नम् अध्यात्मम्’ — संपूर्ण अध्यात्म को, अर्थात् अपने भीतर के आत्म-तत्त्व को। ‘कर्म चाखिलम्’ — समस्त कर्म को, अर्थात् सृष्टि की प्रक्रिया और कर्म के रहस्य को। आचार्य शंकर कहते हैं कि वे ब्रह्म को, प्रत्यगात्मा-विषयक संपूर्ण वस्तु को और समस्त कर्म को जानते हैं।

आचार्य रामानुज यहाँ एक विशेष दृष्टि देते हैं — वे कहते हैं कि यह श्लोक उन साधकों की बात करता है जो शुद्ध आत्मस्वरूप (कैवल्य) की प्राप्ति के लिए भगवान् की उपासना करते हैं। उन्हें अपनी आत्मा के स्वरूप और उसके कर्म-बंधन का ज्ञान होना आवश्यक है।

इस श्लोक में आए शब्द — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म — और अगले श्लोक के शब्द अर्जुन के मन में जिज्ञासा जगाते हैं, जो आठवें अध्याय के आरम्भ में प्रश्नों के रूप में प्रकट होती है।

प्रसंग

7.28 में द्वन्द्व-मुक्त, दृढ़व्रत भक्तों का वर्णन था; यह श्लोक बताता है कि वे ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म को जानते हैं। अगला श्लोक (7.30) अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ जोड़कर अध्याय को समाप्त करता है; इन्हीं शब्दों पर अर्जुन 8.1–2 में प्रश्न करता है।

जीवन-शिक्षा

बुढ़ापा और मृत्यु से डरने के बजाय, उनसे परे के सत्य की खोज करें। जीवन में ऐसा ज्ञान अर्जित करें जो शरीर के साथ समाप्त न हो। ईश्वर का आश्रय लेकर किया गया यह प्रयत्न ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

मुख्य शब्द

जरा-मरण
बुढ़ापा और मृत्यु
ब्रह्म
परम सत्य, सबका मूल
अध्यात्म
आत्मा से सम्बन्धित तत्त्व
कर्म (अखिल)
सृष्टि-प्रक्रिया और कर्म का संपूर्ण रहस्य

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