श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 7
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ .
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ॥
अर्थ
जिसने अपने मन को जीत लिया है और जो पूर्णतः शांत है, उसके लिए परमात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में भी सदा समाहित (स्थिर, प्रत्यक्ष) रहता है
शब्दार्थ
- जितात्मनः – जिसने मन को जीत लिया है उसका
- प्रशान्तस्य – पूर्णतः शांत पुरुष का
- परमात्मा – परमात्मा (अथवा परम आत्मा, अंतरात्मा)
- समाहितः – स्थिर, एकाग्र, नित्य उपलब्ध
- शीतोष्णसुखदुःखेषु – सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में
- तथा – तथा, और
- मानापमानयोः – मान और अपमान में
अन्वय
जितात्मनः प्रशान्तस्य (पुरुषस्य) परमात्मा शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः समाहितः (भवति) ।
व्याख्या
मन को मित्र बना लेने का फल क्या है? इस श्लोक में भगवान् बताते हैं कि जितात्मा और प्रशांत पुरुष के भीतर परमात्मा सदा स्थिर रूप से प्रकाशित रहता है। उसके चित्त में परमात्मा की अनुभूति किसी विशेष समय या स्थान पर निर्भर नहीं रहती; वह जीवन के सब द्वन्द्वों के बीच भी अविचल रहती है।
भगवान् तीन प्रकार के द्वन्द्व गिनाते हैं — शीत-उष्ण (शरीर के स्तर पर), सुख-दुःख (मन के स्तर पर), और मान-अपमान (समाज और अहंकार के स्तर पर)। साधारण मनुष्य इन तीनों से बार-बार डोलता है। ठंड-गर्मी से शरीर बेचैन होता है, सुख-दुःख से मन ऊपर-नीचे होता है, और प्रशंसा-निंदा से अहंकार फूलता या घायल होता है। जितात्मा इन सबको आते-जाते मौसम की तरह देखता है।
‘परमात्मा समाहितः’ की व्याख्या आचार्यों ने दो प्रकार से की है। आचार्य शंकर के अनुसार ऐसे पुरुष का आत्मा ही ‘परम’ अर्थात् साक्षात् परमात्म-स्वरूप हो जाता है और वह सदा समाधिस्थ रहता है। आचार्य रामानुज ‘परमात्मा’ को ‘परम आत्मा’ — अर्थात् जीव का शुद्ध स्वरूप — मानकर कहते हैं कि द्वन्द्वों के बीच भी उसका मन आत्मस्वरूप में एकाग्र रहता है।
दोनों दृष्टियों का सार यह है कि बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहें, भीतर का केंद्र नहीं बदलता। यही सच्ची समाधि है जो आँख खोलकर भी बनी रहती है।
प्रसंग
6.5–6 में मन को जीतने की आवश्यकता बताई गई; यह श्लोक उसके फल का वर्णन करता है। आगे 6.8–9 में योगी की समता और भी विस्तार से — वस्तुओं के प्रति और व्यक्तियों के प्रति — बताई गई है।
जीवन-शिक्षा
जीवन में गर्मी-सर्दी, लाभ-हानि, प्रशंसा-आलोचना आते ही रहेंगे। इन्हें रोकना हमारे हाथ में नहीं, पर इनसे अपनी आंतरिक शांति न डिगने देना हमारे अभ्यास में है। अगली बार किसी की आलोचना सुनें तो एक क्षण रुककर अपने भीतर के स्थिर केंद्र को याद करें।
मुख्य शब्द
- जितात्मा
- मन-इन्द्रियों पर विजय पाने वाला
- प्रशान्त
- राग-द्वेष से रहित, पूर्ण शांत
- समाहित
- एकाग्र, स्थिर रूप से स्थित
- द्वन्द्व
- विरोधी युग्म — सुख-दुःख, मान-अपमान आदि
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.2 – यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं
- गीता 6.3 – आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते
- गीता 6.4 – यदा हि नेन्द्रियार्थेषु
- गीता 6.5 – उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्
- गीता 6.6 – बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः
- गीता 6.8 – ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
- गीता 6.9 – सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
- गीता 6.10 – योगी युञ्जीत सततमात्मानं
- गीता 6.11 – शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य
- गीता 6.12 – तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा