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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 8

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

duḥkhamityeva yatkarma kāyakleśabhayāttyajet .
sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet ॥

अर्थ

जो कर्म को ‘यह दुःखरूप है’ ऐसा समझकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह राजस त्याग करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं करता

शब्दार्थ

  • दुःखम् – दुःखदायी
  • इति एव – ऐसा ही समझकर
  • यत् – जो
  • कर्म – कर्म
  • कायक्लेशभयात् – शरीर को कष्ट होने के भय से
  • त्यजेत् – त्याग दे
  • सः – वह
  • कृत्वा – करके
  • राजसम् – रजोगुणी
  • त्यागम् – त्याग को
  • न एव – बिल्कुल नहीं
  • त्यागफलम् – त्याग के फल (शान्ति, चित्तशुद्धि) को
  • लभेत् – प्राप्त करता है

अन्वय

यत् कर्म ‘दुःखम्’ इति एव कायक्लेशभयात् त्यजेत्, सः राजसं त्यागं कृत्वा त्यागफलं न एव लभेत् ।

व्याख्या

दूसरा प्रकार राजस त्याग है। यहाँ व्यक्ति मोहग्रस्त नहीं है — वह जानता है कि कर्म करना उचित है — पर उसे कर्म ‘दुःखम्’ लगता है, कष्टदायक लगता है। ‘कायक्लेशभयात्’ — शरीर को होने वाली थकान, असुविधा, परिश्रम के भय से वह कर्तव्य छोड़ देता है। जैसे कोई सुबह उठकर साधना करना जानता है, पर नींद की सुविधा छोड़ना उसे भारी लगता है; या कोई सेवा का महत्त्व जानता है, पर परिश्रम से बचना चाहता है।

इस त्याग का मूल रजोगुण है, क्योंकि रजोगुण सुख की लालसा और दुःख से भागने की प्रवृत्ति पैदा करता है। व्यक्ति अपनी सुविधा को केन्द्र में रखकर निर्णय लेता है, कर्तव्य को नहीं। बाहर से वह भी कह सकता है कि मैंने कर्म छोड़ दिया, पर यह त्याग वास्तव में अपने सुख की रक्षा है।

भगवान इसका परिणाम स्पष्ट बताते हैं — ‘नैव त्यागफलं लभेत्’, उसे त्याग का फल बिल्कुल नहीं मिलता। सच्चे त्याग का फल है चित्त की शुद्धि, शान्ति और अन्ततः ज्ञान या मोक्ष। राजस त्यागी को ये नहीं मिलते, क्योंकि उसने कर्म तो छोड़ा पर सुख की आसक्ति नहीं छोड़ी; बन्धन का असली कारण वैसे का वैसा बना रहा।

अर्जुन के प्रसंग में भी यह भाव था — युद्ध के भयंकर कष्ट और स्वजनों के वध के दुःख से बचने के लिए वह भिक्षा माँगकर जीने की बात कह रहा था (2.5)। शंकराचार्य कहते हैं कि ऐसा त्याग केवल दुःख से बचने का उपाय है, ज्ञान से उत्पन्न सर्वकर्म-संन्यास नहीं, इसलिए वह मोक्ष रूपी फल नहीं देता।

प्रसंग

पिछले श्लोक में मोह से किए गए तामस त्याग का वर्णन था। यह श्लोक कष्ट के भय से किए गए राजस त्याग को बताता है। अगले श्लोक (18.9) में सर्वश्रेष्ठ — सात्त्विक त्याग — का वर्णन है।

जीवन-शिक्षा

कठिन होने मात्र से किसी कर्तव्य को छोड़ना त्याग नहीं, सुविधा की आसक्ति है। अपनी सुविधा के बजाय अपने दायित्व को निर्णय का आधार बनाएँ। जो कष्ट उचित कर्म में आता है, वही मन को मज़बूत और शुद्ध बनाता है।

मुख्य शब्द

कायक्लेश
शरीर को होने वाला कष्ट और परिश्रम
राजस त्याग
कष्ट के भय या सुविधा की चाह से किया गया त्याग
त्यागफल
सच्चे त्याग से मिलने वाली शान्ति और चित्तशुद्धि

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