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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 7

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

niyatasya tu saṃnyāsaḥ karmaṇo nopapadyate .
mohāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ ॥

अर्थ

नियत (शास्त्रविहित, कर्तव्य) कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसका त्याग कर देना ‘तामस त्याग’ कहा गया है

शब्दार्थ

  • नियतस्य – नियत, निर्धारित कर्तव्य का
  • तु – परन्तु
  • संन्यासः – त्याग
  • कर्मणः – कर्म का
  • न उपपद्यते – उचित नहीं है, युक्तिसंगत नहीं
  • मोहात् – मोह (अज्ञान) के कारण
  • तस्य – उसका
  • परित्यागः – पूर्ण त्याग
  • तामसः – तमोगुणी
  • परिकीर्तितः – कहा गया है

अन्वय

नियतस्य कर्मणः तु संन्यासः न उपपद्यते; मोहात् तस्य परित्यागः तामसः परिकीर्तितः ।

व्याख्या

अब भगवान तीन प्रकार के त्याग का वर्णन आरम्भ करते हैं, और सबसे निम्न — तामस त्याग — से शुरू करते हैं। ‘नियत कर्म’ वे हैं जो व्यक्ति के जीवन-स्थिति, स्वभाव और शास्त्र के अनुसार उसके लिए निर्धारित हैं — जैसे विद्यार्थी का अध्ययन, गृहस्थ का परिवार-पालन, योद्धा का धर्मयुद्ध। ऐसे कर्मों का त्याग ‘न उपपद्यते’ — युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि इन्हीं से जीवन और समाज की व्यवस्था चलती है और इन्हीं से चित्त शुद्ध होता है।

जब कोई व्यक्ति मोह के कारण कर्तव्य छोड़ता है, तो वह त्याग तामस है। मोह का अर्थ है सही-गलत का विवेक धुँधला हो जाना। उदाहरण के लिए, कोई सोचे कि ‘सब कर्म बन्धन हैं, इसलिए मैं कुछ नहीं करूँगा’ — और फिर आलस्य और अकर्मण्यता में पड़ा रहे। बाहर से यह त्याग जैसा दिख सकता है, पर भीतर यह अज्ञान और जड़ता है।

यह श्लोक अर्जुन की स्थिति पर सीधा लागू होता है। पहले अध्याय में अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपना नियत कर्म — धर्मयुद्ध — छोड़ने को तैयार था, और उसे वह त्याग और करुणा समझ रहा था। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मोह से प्रेरित ऐसा त्याग तामस है, सात्त्विक नहीं।

शंकराचार्य कहते हैं कि अज्ञानी के लिए नित्य कर्म शुद्धि का साधन है, इसलिए उसे छोड़ना स्वयं के प्रति अन्याय है; ऐसा त्याग मोहमूलक होने से तामस है। रामानुजाचार्य जोड़ते हैं कि नित्य-नैमित्तिक कर्म भगवान की आराधना हैं, इसलिए उन्हें बन्धनकारी समझकर छोड़ना विपरीत ज्ञान है।

प्रसंग

पिछले श्लोक में भगवान ने अपना उत्तम मत दिया कि कर्म आसक्ति और फल छोड़कर करने चाहिए। अब वे त्याग के तीन भेद बताते हैं। यह तामस त्याग है; अगले श्लोक (18.8) में राजस त्याग और 18.9 में सात्त्विक त्याग का वर्णन है।

जीवन-शिक्षा

आलस्य या भ्रम को ‘वैराग्य’ का नाम देकर कर्तव्य से न भागें। जो जिम्मेदारियाँ आपके जीवन की स्थिति ने आपको सौंपी हैं, वे आपकी उन्नति का साधन हैं। भ्रम की स्थिति में निर्णय लेने से पहले विवेक से सोचें या किसी जानकार से मार्गदर्शन लें।

मुख्य शब्द

नियत कर्म
जीवन-स्थिति और शास्त्र के अनुसार निर्धारित कर्तव्य
मोह
विवेक का धुँधला हो जाना, भ्रम
तामस त्याग
अज्ञान और जड़ता से किया गया कर्तव्य-त्याग
परित्याग
पूरी तरह छोड़ देना

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