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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 6

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca .
kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam ॥

अर्थ

हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तप रूपी कर्मों को भी आसक्ति और फलों की इच्छा त्यागकर करना चाहिए — यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है

शब्दार्थ

  • एतानि – ये
  • अपि तु – भी, परन्तु
  • कर्माणि – कर्म
  • सङ्गम् – आसक्ति को
  • त्यक्त्वा – त्यागकर
  • फलानि – फलों को
  • च – और
  • कर्तव्यानि – करने चाहिए
  • इति – यह
  • मे – मेरा
  • पार्थ – हे पृथापुत्र अर्जुन
  • निश्चितम् – निश्चित किया हुआ
  • मतम् – मत
  • उत्तमम् – श्रेष्ठ

अन्वय

पार्थ, एतानि कर्माणि अपि तु सङ्गं फलानि च त्यक्त्वा कर्तव्यानि इति मे निश्चितम् उत्तमं मतम् ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में भगवान ने कहा कि यज्ञ, दान और तप कभी नहीं छोड़ने चाहिए। पर इतना कहना अधूरा होता, क्योंकि ये श्रेष्ठ कर्म भी यदि स्वर्ग, यश या पुण्य-संचय की इच्छा से किए जाएँ तो बन्धन का कारण बन जाते हैं। इसलिए भगवान यहाँ एक महत्त्वपूर्ण शर्त जोड़ते हैं — ‘सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च’, आसक्ति और फल दोनों को त्यागकर इन्हें करना चाहिए।

यहाँ दो बातें अलग-अलग कही गई हैं — ‘सङ्ग’ और ‘फल’। सङ्ग है कर्म के प्रति ममता और कर्तापन का अभिमान — ‘मैं कर रहा हूँ, यह मेरा कर्म है।’ फल है कर्म से मिलने वाला परिणाम — लाभ, प्रशंसा, स्वर्ग आदि। सच्चा त्याग दोनों का है। केवल फल छोड़ना पर्याप्त नहीं; कर्म से चिपकना भी छूटना चाहिए, तभी कर्म शुद्ध यज्ञ बनता है।

‘निश्चितं मतम् उत्तमम्’ — यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है। भगवान ने पूर्व के चार मतों को सुना कर अब उनका समन्वय कर दिया है। मीमांसकों से वे सहमत हैं कि कर्म नहीं छोड़ने चाहिए; सांख्यवादियों के ‘त्याग’ के आग्रह को भी वे स्वीकार करते हैं, पर त्याग को कर्म से हटाकर आसक्ति और फल पर स्थापित कर देते हैं। यही गीता का कर्मयोग है।

शंकराचार्य यहाँ कहते हैं कि यह उपदेश मुमुक्षु कर्मी के लिए है, जिसके लिए ये कर्म चित्त-शुद्धि द्वारा ज्ञान की ओर ले जाने वाले हैं। रामानुजाचार्य के अनुसार यही वास्तविक संन्यास है — कर्म करते हुए फल, आसक्ति और कर्तृत्व को भगवान को अर्पित कर देना।

प्रसंग

पिछले श्लोक में यज्ञ, दान, तप को अनिवार्य कहा गया। यह श्लोक बताता है कि उन्हें किस भाव से किया जाए। अगले श्लोक (18.7) से भगवान त्याग के तीन प्रकार — तामस, राजस और सात्त्विक — का वर्णन आरम्भ करते हैं।

जीवन-शिक्षा

अच्छे कर्म भी यदि बदले की आशा से किए जाएँ तो मन को बाँधते हैं। सेवा करें, पर ‘मैंने किया’ का अभिमान और ‘मुझे क्या मिलेगा’ की चिन्ता छोड़ दें। कर्म को कर्तव्य और अर्पण मानकर करने से वह हल्का और आनन्दपूर्ण हो जाता है।

मुख्य शब्द

सङ्ग
कर्म के प्रति आसक्ति और कर्तापन का अभिमान
फलत्याग
कर्म के परिणाम की इच्छा का त्याग
उत्तम मत
भगवान का श्रेष्ठ, अन्तिम सिद्धान्त
कर्मयोग
अनासक्त भाव से कर्तव्य कर्म करने का मार्ग

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