श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 16
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ .
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ ॥
अर्थ
ऐसा होने पर भी जो व्यक्ति अशुद्ध (असंस्कृत) बुद्धि के कारण केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता मानता है, वह दुर्बुद्धि यथार्थ को नहीं देखता
शब्दार्थ
- तत्र – वहाँ, कर्म के विषय में
- एवम् – इस प्रकार
- सति – होने पर
- कर्तारम् – कर्ता
- आत्मानम् – आत्मा को
- केवलम् – केवल, शुद्ध (उपाधिरहित)
- तु – परन्तु
- यः – जो
- पश्यति – देखता है, मानता है
- अकृतबुद्धित्वात् – बुद्धि के संस्कारित न होने के कारण
- न – नहीं
- सः – वह
- पश्यति – देखता है
- दुर्मतिः – दुर्बुद्धि, विपरीत समझ वाला
अन्वय
तत्र एवं सति यः तु अकृतबुद्धित्वात् केवलम् आत्मानं कर्तारं पश्यति, सः दुर्मतिः न पश्यति ।
व्याख्या
पिछले तीन श्लोकों के विश्लेषण से निष्कर्ष निकलता है: जब कर्म पाँच कारणों के संयोग से होता है, तब शुद्ध आत्मा — ‘केवल आत्मा’, जो देह, इन्द्रिय, मन से भिन्न और निरुपाधिक है — कर्ता नहीं हो सकती। फिर भी जो व्यक्ति ऐसा मानता है कि ‘मैं, यह आत्मा, ही सब कुछ करता हूँ’, वह ‘न पश्यति’ — सत्य को नहीं देखता।
भगवान इसका कारण बताते हैं — ‘अकृतबुद्धित्वात्’, अर्थात् उसकी बुद्धि शास्त्र, गुरु और विवेक द्वारा संस्कारित नहीं हुई है। ऐसी बुद्धि देह और आत्मा का भेद नहीं कर पाती और देह के धर्मों को आत्मा पर आरोपित कर देती है। जैसे चलती नाव में बैठा व्यक्ति किनारे के पेड़ों को चलता हुआ समझे, वैसे ही अज्ञानी प्रकृति की क्रियाओं को आत्मा की क्रिया समझ लेता है।
‘दुर्मतिः’ — यह कठोर शब्द इसलिए है क्योंकि यही भ्रम सभी दुःखों की जड़ है। ‘मैं कर्ता हूँ’ के साथ ही ‘मैं भोक्ता हूँ’ जुड़ता है, और फिर सुख-दुःख, पाप-पुण्य, जन्म-मृत्यु का पूरा चक्र चल पड़ता है।
शंकराचार्य इस श्लोक को आत्मा की अकर्तृता का स्पष्ट प्रमाण मानते हैं। रामानुजाचार्य ‘केवलम्’ शब्द पर बल देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति परमात्मा की अन्तर्यामी प्रेरणा और अन्य कारणों को भूलकर केवल स्वयं को स्वतन्त्र कर्ता मानता है, वह दुर्मति है। दोनों व्याख्याओं में सार एक है — स्वतन्त्र कर्तापन का अभिमान अज्ञान है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में बताया गया कि हर कर्म पाँच कारणों से होता है। यह श्लोक बताता है कि इसके बावजूद आत्मा को अकेला कर्ता मानना अज्ञान है। अगले श्लोक (18.17) में बताया गया है कि जो अहंकार से मुक्त है, वह कर्म करते हुए भी नहीं बँधता।
जीवन-शिक्षा
‘सब कुछ मैं ही करता हूँ’ — यह भावना अहंकार और तनाव दोनों को जन्म देती है। स्वयं को कर्मों के प्रवाह का साक्षी और ईश्वर का साधन मानने से मन शान्त होता है। विवेक और स्वाध्याय से बुद्धि को निरन्तर परिष्कृत करते रहें।
मुख्य शब्द
- केवल आत्मा
- देह-इन्द्रिय आदि उपाधियों से रहित शुद्ध आत्मा
- अकृतबुद्धि
- जिसकी बुद्धि शास्त्र और विवेक से संस्कारित नहीं
- दुर्मति
- विपरीत या दूषित समझ वाला
- कर्तृत्व-अभिमान
- ‘मैं कर्ता हूँ’ का अहंकार
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.11 – न हि देहभृता
- गीता 18.12 – अनिष्टमिष्टं मिश्रं च
- गीता 18.13 – पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि
- गीता 18.14 – अधिष्ठानं तथा कर्ता
- गीता 18.15 – शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः
- गीता 18.17 – यस्य नाहंकृतो भावो
- गीता 18.18 – ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता
- गीता 18.19 – ज्ञानं कर्म च
- गीता 18.20 – सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते
- गीता 18.21 – पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं