श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 14
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham .
vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam ॥
अर्थ
इस विषय में (कर्म की सिद्धि के) पाँच कारण हैं — अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (इन्द्रियाँ), अनेक प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव
शब्दार्थ
- अधिष्ठानम् – आधार — शरीर
- तथा – तथा
- कर्ता – कर्ता — अहंकारयुक्त जीव
- करणम् – साधन — इन्द्रियाँ और मन-बुद्धि
- च – और
- पृथग्विधम् – भिन्न-भिन्न प्रकार के
- विविधाः – अनेक प्रकार की
- च – और
- पृथक् – अलग-अलग
- चेष्टाः – क्रियाएँ, प्राणों की गतियाँ
- दैवम् – दैव — अधिष्ठात्री देवता, ईश्वरीय शक्ति या प्रारब्ध
- च एव – और भी
- अत्र – यहाँ, इनमें
- पञ्चमम् – पाँचवाँ
अन्वय
अत्र अधिष्ठानं तथा कर्ता पृथग्विधं करणं च विविधाः पृथक् चेष्टाः च पञ्चमं दैवं च एव ।
व्याख्या
भगवान अब कर्म के पाँच कारण गिनाते हैं। पहला है ‘अधिष्ठान’ — वह आधार जिसमें कर्म होता है, अर्थात् शरीर। बिना शरीर के कोई भौतिक कर्म सम्भव नहीं। दूसरा है ‘कर्ता’ — वह जो ‘मैं करता हूँ’ ऐसा मानता है। यह अहंकार से युक्त जीव है, जो कर्म का संकल्प करता है।
तीसरा है ‘पृथग्विधं करणम्’ — भिन्न-भिन्न प्रकार के साधन, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान आदि), कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, वाणी आदि) और अन्तःकरण (मन, बुद्धि)। प्रत्येक साधन का अपना अलग कार्य है। चौथा है ‘विविधाः पृथक् चेष्टाः’ — अनेक प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ, जिन्हें प्राण, अपान आदि पाँच प्राणों की क्रियाएँ भी माना गया है। ये ही शरीर और इन्द्रियों को गति देती हैं।
पाँचवाँ और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारण है ‘दैव’। इसके कई अर्थ आचार्यों ने दिए हैं। शंकराचार्य के अनुसार दैव इन्द्रियों के अधिष्ठात्री देवता हैं — जैसे नेत्र के सूर्य, हाथ के इन्द्र। रामानुजाचार्य दैव को अन्तर्यामी परमात्मा मानते हैं, जो सबके भीतर रहकर कर्म को सम्भव बनाते हैं। मध्वाचार्य भी दैव को भगवान विष्णु ही मानते हैं, जो सबके प्रेरक हैं। कुछ लोग इसे प्रारब्ध या भाग्य के रूप में भी समझते हैं — वह अदृश्य तत्त्व जो हमारे प्रयत्नों के बावजूद परिणाम को प्रभावित करता है।
इस सूची का निहितार्थ गहरा है: आत्मा इन पाँचों में से कोई नहीं है। आत्मा तो साक्षी है, जिसकी उपस्थिति में ये पाँचों अपना कार्य करते हैं। कर्म इन पाँचों के मेल से होता है, इसलिए किसी एक को — विशेषकर शुद्ध आत्मा को — एकमात्र कर्ता मानना अज्ञान है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में भगवान ने पाँच कारणों को बताने की भूमिका बाँधी। इस श्लोक में वे पाँचों को गिनाते हैं। अगले श्लोक (18.15) में बताया गया है कि शरीर, वाणी और मन से होने वाले सभी कर्म — उचित हों या अनुचित — इन्हीं पाँच कारणों से होते हैं।
जीवन-शिक्षा
किसी भी सफलता के पीछे शरीर, बुद्धि, साधन, प्रयास और ईश्वरीय कृपा — सबका योगदान होता है। इस बात को स्मरण रखने से अहंकार नहीं बढ़ता और कृतज्ञता का भाव जागता है। परिणाम केवल हमारे हाथ में नहीं, इसलिए प्रयत्न पूरा करें और फल को सहजता से स्वीकारें।
मुख्य शब्द
- अधिष्ठान
- कर्म का आधार — शरीर
- कर्ता
- ‘मैं करता हूँ’ ऐसा मानने वाला अहंकारयुक्त जीव
- करण
- इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि — कर्म के साधन
- चेष्टा
- प्राणों की विविध क्रियाएँ
- दैव
- अधिष्ठात्री देवता, अन्तर्यामी ईश्वर या प्रारब्ध
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.9 – कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं
- गीता 18.10 – न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म
- गीता 18.11 – न हि देहभृता
- गीता 18.12 – अनिष्टमिष्टं मिश्रं च
- गीता 18.13 – पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि
- गीता 18.15 – शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः
- गीता 18.16 – तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं
- गीता 18.17 – यस्य नाहंकृतो भावो
- गीता 18.18 – ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता
- गीता 18.19 – ज्ञानं कर्म च