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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 26

अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

māṃ ca yo.avyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate .
sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate ॥

अर्थ

और जो पुरुष अव्यभिचारी (अनन्य, अविचल) भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को भली-भाँति पार करके ब्रह्म-भाव को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है

शब्दार्थ

  • माम् – मुझे, मेरी
  • च – और
  • यः – जो
  • अव्यभिचारेण – अव्यभिचारी, अनन्य और अविचल
  • भक्तियोगेन – भक्तियोग के द्वारा
  • सेवते – सेवा (उपासना) करता है
  • सः – वह
  • गुणान् – गुणों को
  • समतीत्य – भली-भाँति पार करके
  • एतान् – इन
  • ब्रह्मभूयाय – ब्रह्मभाव के लिए, ब्रह्मरूप होने के लिए
  • कल्पते – योग्य होता है

अन्वय

यः च माम् अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते, सः एतान् गुणान् समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।

व्याख्या

अब भगवान् अर्जुन के तीसरे और सबसे व्यावहारिक प्रश्न का उत्तर देते हैं — गुणों को पार कैसे करें? उत्तर अत्यन्त सरल और गहन है: अव्यभिचारी भक्तियोग से भगवान् की सेवा।

‘अव्यभिचारेण’ — यह शब्द भक्ति की गुणवत्ता बताता है। ‘व्यभिचार’ का अर्थ है भटकना, एक से हटकर दूसरे में लगना। अव्यभिचारी भक्ति वह है जो एकनिष्ठ हो — जिसमें भगवान् के अतिरिक्त कोई दूसरा आश्रय न हो, जो सुख में भी बनी रहे और दुःख में भी, जो किसी सांसारिक फल की शर्त पर न टिकी हो। जैसे पतिव्रता स्त्री का प्रेम एक ही ओर बहता है, वैसे ही भक्त का चित्त निरन्तर भगवान् की ओर बहता है।

‘सेवते’ — सेवा करता है। भक्ति केवल भावना नहीं, सक्रिय सेवा है। अपने सब कर्म भगवान् को अर्पित करना, सब प्राणियों में उन्हें देखकर उनकी सेवा करना, उनका स्मरण, कीर्तन और ध्यान — ये सब इस सेवा के रूप हैं।

भक्ति गुणों को पार क्यों करा देती है? इसका कारण अत्यन्त सुन्दर है। गुण प्रकृति के हैं, और सातवें अध्याय में भगवान् ने कहा था कि ‘मेरी यह त्रिगुणमयी माया दुस्तर है, पर जो मेरी शरण में आते हैं वे इसे पार कर जाते हैं’ (7.14)। जब जीव प्रकृति के स्वामी की शरण लेता है, तो प्रकृति के गुण उसे बाँध नहीं पाते। जब मन सदा भगवान् में लगा है, तो सत्त्व के सुख में, रज की कामना में या तम के मोह में चिपकने का अवसर ही नहीं रहता।

‘ब्रह्मभूयाय कल्पते’ — वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है। आचार्य शंकर इसे ब्रह्म से एकत्व की प्राप्ति मानते हैं, जहाँ भक्ति अन्ततः ज्ञान में परिणत होती है। आचार्य रामानुज इसे आत्मा की शुद्ध, गुणरहित, ब्रह्म-समान अवस्था की प्राप्ति मानते हैं, जिसमें जीव भगवान् की नित्य सेवा में रहता है। आचार्य मध्व भी इसे भगवान् की कृपा से प्राप्त मुक्ति के रूप में समझाते हैं, जहाँ भक्ति ही प्रमुख साधन है।

यह श्लोक चौदहवें अध्याय का चरम बिन्दु है। पूरा अध्याय गुणों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है, जो ज्ञानमार्ग जैसा प्रतीत होता है; पर अन्त में भगवान् बताते हैं कि गुणों को पार करने का सबसे सीधा मार्ग उनके प्रति अनन्य प्रेम है। ज्ञान मार्ग दिखाता है, भक्ति उस पर चलने की शक्ति देती है।

प्रसंग

पिछले चार श्लोकों में गुणातीत के लक्षण और आचरण बताए गए; यह श्लोक अर्जुन के तीसरे प्रश्न — उपाय — का उत्तर है। अगले और अन्तिम श्लोक में भगवान् बताते हैं कि भक्ति ब्रह्मभाव क्यों देती है — क्योंकि वे स्वयं ब्रह्म की प्रतिष्ठा हैं।

जीवन-शिक्षा

गुणों से लड़कर उन्हें जीतना कठिन है; पर जब मन भगवान् के प्रेम में एकनिष्ठ होकर लग जाता है, तो वे अपने-आप अपनी पकड़ खो देते हैं। अपने हर कर्म को भगवान् की सेवा बना दीजिए।

मुख्य शब्द

अव्यभिचारी भक्ति
अनन्य, अविचल भक्ति जो भगवान् के सिवा कहीं न भटके
भक्तियोग
प्रेम और समर्पण द्वारा भगवान् से जुड़ने का मार्ग
ब्रह्मभूय
ब्रह्मभाव, ब्रह्मरूप होना — मुक्ति

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