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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 25

अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ .
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate ॥

अर्थ

जो मान और अपमान में सम है, मित्र और शत्रु के पक्ष में सम है, और जिसने सब (सकाम) आरम्भों का त्याग कर दिया है — वह गुणातीत कहा जाता है

शब्दार्थ

  • मानापमानयोः – मान और अपमान में
  • तुल्यः – समान
  • तुल्यः – समान
  • मित्रारिपक्षयोः – मित्र और शत्रु के पक्ष में
  • सर्वारम्भपरित्यागी – सब (स्वार्थपूर्ण) आरम्भों का त्याग करने वाला
  • गुणातीतः – गुणों से अतीत
  • सः – वह
  • उच्यते – कहा जाता है

अन्वय

(यः) मानापमानयोः तुल्यः, मित्रारिपक्षयोः तुल्यः, सर्वारम्भपरित्यागी (च), सः गुणातीतः उच्यते ।

व्याख्या

यह श्लोक गुणातीत के लक्षणों और आचरण के वर्णन को पूर्ण करता है। पिछले श्लोक में निन्दा-स्तुति की समता बताई गई थी; यहाँ ‘मानापमान’ की समता बताई जाती है। निन्दा-स्तुति शब्दों से होती है, जबकि मान-अपमान व्यवहार से — किसी का आदर से स्वागत करना या उसकी अवहेलना करना। गुणातीत दोनों में अविचल रहता है।

‘तुल्यो मित्रारिपक्षयोः’ — वह मित्र और शत्रु के पक्ष में भी तुल्य है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसके मित्र या शत्रु होते ही नहीं — संसार में लोग उसे मित्र या शत्रु मान सकते हैं — पर उसके अपने मन में किसी के प्रति पक्षपात या वैर नहीं होता। वह सबका हित चाहता है। महाभारत में भीष्म और विदुर जैसे पात्रों में इस भाव की झलक मिलती है।

‘सर्वारम्भपरित्यागी’ — वह सब आरम्भों का त्यागी है। यहाँ ‘आरम्भ’ से तात्पर्य उन कर्मों से है जो कामना और अहंकार से प्रेरित होकर दृश्य या अदृश्य फल के लिए आरम्भ किए जाते हैं। आचार्य शंकर के अनुसार गुणातीत केवल शरीर-निर्वाह के लिए आवश्यक कर्मों को छोड़कर सब सकाम कर्मों का त्याग कर देता है। अन्य व्याख्याकार इसका अर्थ कर्तापन के भाव से कर्म आरम्भ करने का त्याग मानते हैं — वह कर्म करता है, पर ‘मैं करता हूँ’ के भाव से नहीं।

‘गुणातीतः स उच्यते’ — ऐसा व्यक्ति गुणातीत कहलाता है। श्लोक 22 से 25 तक का वर्णन एक ओर सिद्ध पुरुष के लक्षण हैं, और दूसरी ओर साधक के लिए साधन भी। आचार्य शंकर कहते हैं कि जब तक ये लक्षण स्वाभाविक न हो जाएँ, तब तक साधक को इन्हें प्रयत्नपूर्वक अभ्यास में लाना चाहिए।

प्रसंग

श्लोक 22–24 में गुणातीत के आन्तरिक लक्षण, साक्षी-भाव और समता का वर्णन हुआ; यह श्लोक उस वर्णन को पूर्ण करता है। अगले श्लोक में भगवान् अर्जुन के तीसरे प्रश्न — गुणों को कैसे पार करें — का उत्तर देते हैं: अव्यभिचारी भक्ति।

जीवन-शिक्षा

मान-अपमान और मित्र-शत्रु के भेद से ऊपर उठकर सबके प्रति सद्भाव रखना ही परिपक्वता है। कर्म करते रहें, पर अहंकार और कामना से प्रेरित नए-नए बन्धन मत गढ़ें।

मुख्य शब्द

मानापमान
आदर और अनादर
सर्वारम्भपरित्यागी
कामना और कर्तापन से किए जाने वाले सब आरम्भों का त्यागी
गुणातीत
तीनों गुणों से ऊपर उठा हुआ मुक्त पुरुष

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