श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 23
अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
udāsīnavadāsīno guṇairyo na vicālyate .
guṇā vartanta ityevaṃ yo.avatiṣṭhati neṅgate ॥
अर्थ
जो उदासीन (तटस्थ साक्षी) के समान स्थित रहकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता, और ‘गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं’ — ऐसा जानकर अपने स्वरूप में स्थिर रहता है और डगमगाता नहीं
शब्दार्थ
- उदासीनवत् – उदासीन के समान, तटस्थ साक्षी की तरह
- आसीनः – स्थित रहता हुआ
- गुणैः – गुणों के द्वारा
- यः – जो
- न विचाल्यते – विचलित नहीं किया जाता
- गुणाः – गुण
- वर्तन्ते – बरत रहे हैं, कार्य कर रहे हैं
- इति एवम् – इस प्रकार (जानकर)
- यः – जो
- अवतिष्ठति – स्थिर रहता है
- न इङ्गते – हिलता-डुलता नहीं, विचलित नहीं होता
अन्वय
यः उदासीनवत् आसीनः गुणैः न विचाल्यते, गुणाः वर्तन्ते इति एव (मत्वा) यः अवतिष्ठति, न इङ्गते ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में गुणातीत का आन्तरिक लक्षण बताया गया; यहाँ उसके आचरण (अर्जुन का दूसरा प्रश्न) का वर्णन आरम्भ होता है। उसकी स्थिति को ‘उदासीनवत् आसीनः’ कहा गया है — उदासीन के समान बैठा हुआ।
‘उदासीन’ का अर्थ यहाँ उदासी या उपेक्षा नहीं है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ऊपर बैठा हुआ’ (उत् + आसीन) — जैसे किसी विवाद में तटस्थ व्यक्ति, जो किसी पक्ष में नहीं होता और दोनों पक्षों को शान्ति से देखता है। गुणातीत पुरुष गुणों के खेल को इसी तरह ऊपर से, साक्षी भाव से देखता है। ‘वत्’ — ‘के समान’ — शब्द भी अर्थपूर्ण है; वह बाहर से सामान्य रूप से कर्म और व्यवहार करता रहता है, पर भीतर से वह इनमें उलझा नहीं होता।
‘गुणैर्यो न विचाल्यते’ — गुण उसे विचलित नहीं कर पाते। सुख की लहर आए या दुःख की, क्रिया का ज्वार आए या जड़ता का, वह अपने केन्द्र से नहीं हटता। इसका रहस्य अगले वाक्य में है — ‘गुणा वर्तन्त इत्येव’ — वह जानता है कि ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं’ (3.28)। इन्द्रियाँ विषयों में, मन विचारों में, शरीर क्रियाओं में लगा है — ये सब प्रकृति का कार्य है; आत्मा तो साक्षी है।
‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते’ — वह स्थिर रहता है, डगमगाता नहीं। ‘इङ्गते’ का अर्थ है काँपना या हिलना। जैसे वायु-रहित स्थान में दीपक की लौ स्थिर रहती है (6.19), वैसे ही गुणातीत का चित्त अपने स्वरूप में अचल रहता है। यह स्थिरता जड़ता नहीं, बल्कि गहन जागरूक शान्ति है।
इस श्लोक में गीता का एक व्यावहारिक सूत्र छिपा है: जब भी कोई भावना या परिस्थिति हमें बहा ले जाने लगे, तो एक क्षण रुककर कहें — ‘यह गुणों का खेल है’। इतनी-सी समझ हमें प्रतिक्रिया के बजाय विवेकपूर्ण उत्तर देने की क्षमता देती है।
प्रसंग
श्लोक 22 में गुणातीत का आन्तरिक लक्षण बताया गया; यह श्लोक उसके आचरण और स्थिति का वर्णन करता है। अगले दो श्लोकों में उसके समत्व के विविध रूप बताए गए हैं।
जीवन-शिक्षा
जब कोई भावना या परिस्थिति आपको बहा ले जाने लगे, तो रुककर याद करें कि यह गुणों का खेल है और आप उसके साक्षी हैं। यह छोटी-सी समझ प्रतिक्रिया को विवेक में बदल देती है।
मुख्य शब्द
- उदासीन
- ऊपर बैठा तटस्थ साक्षी, जो किसी पक्ष में नहीं
- गुणा वर्तन्ते
- गुण ही गुणों में बरत रहे हैं — आत्मा अकर्ता है
- न इङ्गते
- विचलित नहीं होता, अचल रहता है
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 14.18 – ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था
- गीता 14.19 – नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं
- गीता 14.20 – गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्
- गीता 14.21 – अर्जुन उवाच
- गीता 14.22 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 14.24 – समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः
- गीता 14.25 – मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः
- गीता 14.26 – मां च योऽव्यभिचारेण
- गीता 14.27 – ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य