भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 21

अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate .
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate ॥

अर्थ

कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियों) को उत्पन्न करने और उनके द्वारा कर्म होने में प्रकृति कारण कही जाती है; तथा सुख-दुःख के भोगने में पुरुष कारण कहा जाता है

शब्दार्थ

  • कार्य – कार्य, अर्थात् शरीर तथा उसके तत्त्व
  • कारण – करण, अर्थात् इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि
  • कर्तृत्वे – उत्पन्न करने और कर्म करने में
  • हेतुः – कारण
  • प्रकृतिः – प्रकृति
  • उच्यते – कही जाती है
  • पुरुषः – पुरुष, चेतन जीवात्मा
  • सुखदुःखानाम् – सुख और दुःख के
  • भोक्तृत्वे – भोगने में, अनुभव करने में
  • हेतुः – कारण
  • उच्यते – कहा जाता है

अन्वय

कार्यकारणकर्तृत्वे प्रकृतिः हेतुः उच्यते । सुखदुःखानाम् भोक्तृत्वे पुरुषः हेतुः उच्यते ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में प्रकृति और पुरुष को अनादि कहा गया। अब भगवान् दोनों की भूमिका का बँटवारा करते हैं। ‘कार्य’ से तात्पर्य है शरीर और उसके पंचभूत आदि, और ‘करण’ से तात्पर्य है वे साधन जिनसे कर्म होता है — दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार। इनको उत्पन्न करना और इनके द्वारा क्रिया होना, यह सब प्रकृति का काम है। चलना, बोलना, सोचना, निर्णय करना — ये प्रकृति के गुणों की गतियाँ हैं। तीसरे अध्याय में भी कहा गया था, ‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः’ (3.27)।

दूसरी ओर, सुख और दुःख का अनुभव — ‘भोक्तृत्व’ — पुरुष में होता है। जड़ प्रकृति स्वयं कुछ अनुभव नहीं कर सकती; अनुभव के लिए चेतना चाहिए। इसलिए जो चेतन है, वही भोक्ता बनता है। पर यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि यह भोक्तापन भी प्रकृति के संग से आता है, जैसा अगले श्लोक में स्पष्ट होगा।

शंकराचार्य के अनुसार आत्मा वस्तुतः न कर्ता है, न भोक्ता; भोक्तृत्व भी अविद्या के कारण बुद्धि में चेतना के प्रतिबिम्ब से आरोपित होता है। रामानुजाचार्य जीव को वास्तविक ज्ञाता और भोक्ता मानते हैं, पर कहते हैं कि शरीर से जुड़ने पर ही वह सुख-दुःख का भागी बनता है; और कर्ता के रूप में भी जीव का कर्तृत्व अन्ततः भगवान् की अनुमति पर निर्भर है। मध्व भी जीव को वास्तविक भोक्ता मानकर भगवान् को सर्वोच्च प्रेरक बताते हैं।

यह विभाजन साधक के लिए बड़ा उपयोगी है। जो यह समझता है कि क्रियाएँ प्रकृति कर रही है, वह ‘मैंने किया’ के अहंकार से बचता है; और जो जानता है कि भोग का मूल प्रकृति से तादात्म्य है, वह उस तादात्म्य को ढीला करने का प्रयास करता है।

प्रसंग

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं। पिछले श्लोक (13.20) में प्रकृति-पुरुष के अनादित्व और विकारों के प्रकृति से उत्पन्न होने की बात कही गई। यह श्लोक दोनों के कार्य बताता है, और अगला श्लोक (13.22) बताएगा कि पुरुष भोक्ता क्यों बनता है और जन्म का कारण क्या है।

जीवन-शिक्षा

कर्म शरीर, मन और इन्द्रियाँ करती हैं; इसलिए उन पर अहंकार करना व्यर्थ है। सुख-दुःख का भार हम इसलिए उठाते हैं कि हम स्वयं को प्रकृति से जोड़ लेते हैं। इस भेद को याद रखकर हम कर्म करते हुए भी भीतर से हल्के रह सकते हैं।

मुख्य शब्द

कार्य
प्रकृति से बना शरीर और उसके तत्त्व
करण
कर्म के साधन — इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि
कर्तृत्व
कर्तापन, क्रिया करने की स्थिति
भोक्तृत्व
भोक्तापन, सुख-दुःख का अनुभव

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