श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 19
अध्याय 12 – भक्तियोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit .
aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ ॥
अर्थ
जिसको निन्दा और स्तुति समान हैं, जो मौनी है, जो जिस किसी वस्तु से भी सन्तुष्ट है, जो अनिकेत और स्थिरबुद्धि है — ऐसा भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है
शब्दार्थ
- तुल्यनिन्दास्तुतिः – निन्दा और स्तुति में समान
- मौनी – मौन (वाणी-संयमी, मननशील)
- सन्तुष्टः – सन्तुष्ट
- येन केनचित् – जिस किसी भी वस्तु से
- अनिकेतः – अनिकेत (गृह-आसक्ति से रहित)
- स्थिरमतिः – स्थिर बुद्धि वाला
- भक्तिमान् – भक्तियुक्त
- नरः – मनुष्य
- मे प्रियः – मुझे प्रिय है
अन्वय
(यः) तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी, येन केनचित् सन्तुष्टः, अनिकेतः, स्थिरमतिः भक्तिमान् नरः, सः मे प्रियः ।
व्याख्या
यह श्लोक पिछले श्लोक के साथ मिलकर वाक्य को पूरा करता है, और ‘मे प्रियो नरः’ पर समाप्त होता है। इसमें समता के और रूप जुड़ते हैं: निन्दा-स्तुति की समानता, मौन, किसी भी वस्तु से सन्तोष, गृहासक्ति से रहित होना और स्थिर बुद्धि।
‘तुल्यनिन्दास्तुतिः’ वह है जिसे दूसरों के प्रशंसा और निन्दा के शब्द समान लगते हैं। यहाँ पिछले श्लोक के मान-अपमान की बात आगे बढ़ती है: मान-अपमान व्यवहार के स्तर पर हैं और निन्दा-स्तुति वाणी के स्तर पर। दोनों के प्रति सम रहने का अर्थ यह है कि भीतर की शान्ति लोगों की जिह्वा पर नहीं टिकी। ‘मौनी’ का अर्थ केवल चुप रहना नहीं; शंकराचार्य के अनुसार वाणी का संयम और मन का मनन। जो व्यर्थ नहीं बोलता और भीतर भगवान् का मनन करता रहता है, वही सच्चा मौनी है।
‘येन केनचित्सन्तुष्टः’ — जो भी मिल जाए उसी में सन्तुष्ट। भोजन, वस्त्र, स्थान, जो भी जैसा मिले, उसमें वह प्रसन्न है। यह उदासीन होना नहीं; यह कृतज्ञता और आन्तरिक पूर्णता है। ‘अनिकेतः’ — जिसका कोई निश्चित गृह नहीं। शंकराचार्य इसका अर्थ संन्यासी के रूप में लेते हैं, जिसका कोई नियत निवास नहीं। रामानुज इसे गृह-आसक्ति से रहित कहते हैं। गृहस्थ भी अनिकेत हो सकता है, यदि घर में रहकर भी वह घर का बन्दी न हो।
अन्त में ‘स्थिरमतिः’ — स्थिर बुद्धि, जो तत्त्व में टिकी है। यह वही स्थितप्रज्ञ की झलक है जिसका वर्णन दूसरे अध्याय में आया था। जब ये सारे गुण एक साथ आ जाते हैं तो वह ‘भक्तिमान्’ पुरुष बनता है।
इस प्रकार भगवान् ने तेरह से उन्नीस तक जो चित्र खींचा, उसका सार यह है कि भक्ति केवल भावुकता नहीं; वह चरित्र, शान्ति, सन्तोष और समता में प्रकट होती है।
प्रसंग
12.18 में समता के तीन युग्म और आसक्ति-त्याग बताए गए थे। यहाँ वही वाक्य निन्दा-स्तुति, मौन, सन्तोष, अनिकेतता और स्थिर बुद्धि पर समाप्त होता है। अगला और अन्तिम श्लोक (12.20) इस पूरे अमृत-उपदेश की महिमा बताता है।
जीवन-शिक्षा
कम बोलना, जो मिले उसमें सन्तोष और घर-वस्तुओं से अत्यधिक चिपकाव न रखना, ये सरल अभ्यास हैं जिनसे मन स्थिर होता है। जो इनका नियमित पालन करता है, उसकी भक्ति शब्दों से नहीं, जीवन से प्रकट होती है।
मुख्य शब्द
- मौनी
- वाणी का संयम और मनन; व्यर्थ बोलने से बचने वाला
- येन केनचित् सन्तुष्ट
- जो मिले उसी में सन्तोष
- अनिकेत
- जिसका कोई नियत घर/स्थान-आसक्ति नहीं; यायावर या घर से अनासक्त
- स्थिरमति
- स्थिर बुद्धि; जिसका चित्त तत्त्व में टिका है