श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 37
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān .
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ॥
अर्थ
इसलिए अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं है; क्योंकि हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम भला कैसे सुखी होंगे?
शब्दार्थ
- तस्मात् – इसलिए
- न – नहीं
- अर्हाः – योग्य, उचित
- वयम् – हम
- हन्तुम् – मारने के लिए
- धार्तराष्ट्रान् – धृतराष्ट्र के पुत्रों को
- स्वबान्धवान् – अपने बन्धुओं को
- स्वजनम् – अपने लोगों को
- हि – क्योंकि
- कथम् – कैसे
- हत्वा – मारकर
- सुखिनः – सुखी
- स्याम – होंगे
- माधव – हे माधव (श्रीकृष्ण)
अन्वय
तस्मात् स्वबान्धवान् धार्तराष्ट्रान् हन्तुं वयं न अर्हाः; माधव, स्वजनं हत्वा हि कथं सुखिनः स्याम ।
व्याख्या
पिछले तर्कों से अर्जुन अब एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं — 'तस्मात्', इसलिए हमें इन्हें नहीं मारना चाहिए। यह शब्द बताता है कि अर्जुन अब भावुक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर एक 'तार्किक' निर्णय की भाषा बोल रहे हैं। परन्तु यह तर्क मोह की नींव पर खड़ा है।
यहाँ अर्जुन धृतराष्ट्र-पुत्रों को 'स्वबान्धवान्' — अपने बन्धु — कहते हैं। श्लोक 23 में वही अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कह रहे थे और कौरवों को ऐसे शत्रु के रूप में देख रहे थे जिनसे लड़ना है। अब वे सब 'अपने' हो गए हैं। यह परिवर्तन बताता है कि मोह किस प्रकार हमारी दृष्टि और भाषा दोनों को बदल देता है।
'कथं सुखिनः स्याम' — हम कैसे सुखी होंगे? — अर्जुन फिर से सुख की कसौटी पर लौटते हैं। उनका पूरा तर्क इस बात पर टिका है कि युद्ध का परिणाम उन्हें सुख देगा या दुःख। गीता आगे सिखाएगी कि सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानकर कर्तव्य करना ही योग है (2.38)। कर्तव्य का निर्णय परिणाम के सुख-दुःख से नहीं, धर्म से होना चाहिए।
श्रीकृष्ण को फिर से 'माधव' कहकर अर्जुन मानो उनसे सहमति माँग रहे हैं — 'हे लक्ष्मीपति, आप ही बताइए, क्या ऐसी विजय से कोई श्री या सुख मिल सकता है?' परन्तु श्रीकृष्ण अभी मौन हैं; वे अर्जुन को अपना पूरा हृदय खोलने दे रहे हैं।
प्रसंग
श्लोक 35-36 के तर्कों से अर्जुन यहाँ निष्कर्ष निकालते हैं। अगले दो श्लोकों में वे एक नया तर्क आरम्भ करते हैं — कुल-नाश से उत्पन्न होने वाले दोष।
जीवन-शिक्षा
मोह हमारी भाषा बदल देता है — कल का 'विरोधी' आज 'अपना' लगने लगता है, और कर्तव्य बोझ लगने लगता है। निर्णय लेते समय यह परखना चाहिए कि हम परिणाम के सुख-दुःख से प्रेरित हैं या धर्म से।
मुख्य शब्द
- स्वबान्धव
- अपने बन्धु, सगे-सम्बन्धी
- माधव
- लक्ष्मीपति; मधु वंश में जन्मे श्रीकृष्ण
- सुख
- प्रसन्नता; यहाँ अर्जुन के तर्क की कसौटी
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 1.32 – न काङ्क्षे विजयं
- गीता 1.33 – येषामर्थे काङ्क्षितं नो
- गीता 1.34 – आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव
- गीता 1.35 – एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि
- गीता 1.36 – निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का
- गीता 1.38 – यद्यप्येते न पश्यन्ति
- गीता 1.39 – कथं न ज्ञेयमस्माभिः
- गीता 1.40 – कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः
- गीता 1.41 – अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः
- गीता 1.42 – सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां