श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 34
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ .
mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā ॥
अर्थ
गुरुजन, चाचा-ताऊ, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी — (ये सब यहाँ युद्ध में खड़े हैं)
शब्दार्थ
- आचार्याः – गुरुजन
- पितरः – पिता-तुल्य (चाचा-ताऊ)
- पुत्राः – पुत्र
- तथा एव च – और वैसे ही
- पितामहाः – पितामह
- मातुलाः – मामा
- श्वशुराः – ससुर
- पौत्राः – पौत्र
- श्यालाः – साले
- सम्बन्धिनः – अन्य सम्बन्धी
- तथा – तथा
अन्वय
आचार्याः, पितरः, पुत्राः, तथा एव च पितामहाः, मातुलाः, श्वशुराः, पौत्राः, श्यालाः तथा सम्बन्धिनः (युद्धे अवस्थिताः) ।
व्याख्या
अर्जुन उन सम्बन्धियों को एक-एक करके गिनाते हैं जो इस युद्ध में आमने-सामने खड़े हैं। यह सूची श्लोक 26-27 में संजय द्वारा दिए गए वर्णन से मेल खाती है, पर यहाँ अर्जुन स्वयं बोल रहे हैं, इसलिए हर शब्द में उनकी पीड़ा झलकती है। 'आचार्य' से आरम्भ करना संयोग नहीं है — द्रोण और कृप के प्रति उनकी श्रद्धा सबसे गहरी थी।
इस सूची में तीन पीढ़ियाँ हैं — पितामह और पिता (बड़ी पीढ़ी), भाई, मामा, साले (समान पीढ़ी), और पुत्र, पौत्र (छोटी पीढ़ी)। साथ ही रक्त-सम्बन्ध और विवाह-सम्बन्ध दोनों हैं। अर्जुन को दिखता है कि यह युद्ध एक पूरे परिवार और एक पूरे समाज के ताने-बाने को नष्ट कर देगा। कोई पीढ़ी, कोई रिश्ता अछूता नहीं रहेगा।
'श्यालाः' अर्थात् साले — जैसे धृष्टद्युम्न और शिखण्डी, जो द्रौपदी के भाई थे और अर्जुन के अपने पक्ष में थे। इससे फिर स्पष्ट होता है कि अर्जुन का दुःख केवल शत्रु-पक्ष के लिए नहीं, दोनों पक्षों के लिए है।
सूची को बार-बार दोहराना विषाद का एक स्वाभाविक लक्षण है। जब मन किसी पीड़ा में डूबा होता है, तो वह उसी विचार पर बार-बार लौटता है। अर्जुन का मन भी इन्हीं सम्बन्धों के चक्र में घूम रहा है, और यही चक्र उन्हें कर्तव्य से दूर ले जा रहा है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा कि जिनके लिए राज्य चाहा था वे ही युद्ध में खड़े हैं; यहाँ वे उन लोगों के नाम-सम्बन्ध गिनाते हैं। अगले श्लोक में वे घोषणा करते हैं कि तीनों लोकों के राज्य के लिए भी वे इन्हें नहीं मारना चाहते।
जीवन-शिक्षा
मन जब पीड़ा में होता है, तो एक ही विचार को बार-बार दोहराता है और उसमें और गहरा डूबता जाता है। ऐसे समय में विचारों के इस चक्र को तोड़ने के लिए किसी विवेकी मार्गदर्शक की बात सुनना आवश्यक है।
मुख्य शब्द
- आचार्य
- गुरु; यहाँ द्रोण और कृप
- श्याल
- पत्नी का भाई, साला
- सम्बन्धी
- विवाह आदि से जुड़े रिश्तेदार
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 1.29 – सीदन्ति मम गात्राणि
- गीता 1.30 – गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव
- गीता 1.31 – निमित्तानि च पश्यामि
- गीता 1.32 – न काङ्क्षे विजयं
- गीता 1.33 – येषामर्थे काङ्क्षितं नो
- गीता 1.35 – एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि
- गीता 1.36 – निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का
- गीता 1.37 – तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं
- गीता 1.38 – यद्यप्येते न पश्यन्ति
- गीता 1.39 – कथं न ज्ञेयमस्माभिः