श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 31
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava .
na ca śreyo.anupaśyāmi hatvā svajanamāhave ॥
अर्थ
हे केशव! मैं विपरीत लक्षण (अपशकुन) भी देख रहा हूँ, और युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण भी दिखाई नहीं देता
शब्दार्थ
- निमित्तानि – लक्षण, शकुन
- च – और
- पश्यामि – देखता हूँ
- विपरीतानि – विपरीत, अशुभ
- केशव – हे केशव (श्रीकृष्ण)
- न – नहीं
- श्रेयः – कल्याण, भलाई
- अनुपश्यामि – देखता हूँ, पूर्वानुमान करता हूँ
- हत्वा – मारकर
- स्वजनम् – अपने लोगों को
- आहवे – युद्ध में
अन्वय
केशव, विपरीतानि निमित्तानि च पश्यामि; आहवे स्वजनं हत्वा श्रेयः च न अनुपश्यामि ।
व्याख्या
शरीर और मन की व्याकुलता के बाद अर्जुन अब बाहरी संकेतों और भविष्य के परिणाम की ओर देखते हैं। 'निमित्तानि विपरीतानि' — विपरीत लक्षण — का अर्थ है अपशकुन। महाभारत में युद्ध से पहले के अनेक अपशकुनों का वर्णन है — आकाश में उल्कापात, पशु-पक्षियों का असामान्य व्यवहार, सूर्य-चन्द्र का मलिन होना। व्यासजी ने भी धृतराष्ट्र को इन्हीं संकेतों के बारे में चेताया था।
परन्तु इस वाक्य का एक दूसरा अर्थ भी है। 'निमित्त' का अर्थ 'कारण' या 'उद्देश्य' भी होता है। तब अर्थ होगा — 'मैं इस युद्ध के उद्देश्यों को उलटा देख रहा हूँ।' अर्जुन को लगता है कि जिस राज्य और सुख के लिए युद्ध लड़ा जा रहा है, वह स्वजनों की मृत्यु से दुःख में बदल जाएगा। उद्देश्य और परिणाम विपरीत हो जाएँगे।
'न च श्रेयोऽनुपश्यामि' — मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता — यह वाक्य बहुत महत्त्वपूर्ण है। 'श्रेय' गीता का एक प्रमुख शब्द है, जिसका अर्थ है वास्तविक, स्थायी कल्याण, जबकि 'प्रेय' का अर्थ है तात्कालिक सुख। अर्जुन श्रेय की बात तो करते हैं, परन्तु उनकी दृष्टि अभी मोह से ढकी है। वे स्वजनों के जीवन को ही श्रेय मान रहे हैं, जबकि सच्चा श्रेय धर्म के पालन में है। आगे दूसरे अध्याय में (2.7) अर्जुन स्वयं श्रीकृष्ण से पूछेंगे — 'जो मेरे लिए निश्चित रूप से श्रेय हो, वह मुझे बताइए।'
अर्जुन श्रीकृष्ण को 'केशव' कहते हैं — सुन्दर केशों वाले, या केशी नामक दैत्य को मारने वाले। जिन्होंने केशी जैसे दैत्य का नाश किया, वही अब अर्जुन के भीतर के मोह-रूपी दैत्य का नाश करेंगे।
प्रसंग
श्लोक 29-30 में अर्जुन ने शारीरिक और मानसिक व्याकुलता का वर्णन किया। यहाँ वे अपशकुन और युद्ध के परिणाम की बात करते हैं। अगले श्लोक से वे विजय, राज्य और सुख की निरर्थकता के तर्क देने लगते हैं।
जीवन-शिक्षा
तात्कालिक सुख (प्रेय) और वास्तविक कल्याण (श्रेय) में भेद करना जीवन की सबसे बड़ी समझ है। जब मन मोह से भरा हो, तब हमें जो 'श्रेय' दिखता है, वह भी भ्रम हो सकता है; इसलिए सच्चे मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
मुख्य शब्द
- निमित्त
- शकुन, लक्षण; अथवा कारण, उद्देश्य
- श्रेय
- वास्तविक और स्थायी कल्याण
- केशव
- सुन्दर केशों वाले; केशी दैत्य का वध करने वाले श्रीकृष्ण
- आहव
- युद्ध, संग्राम
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 1.26 – तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्
- गीता 1.27 – श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि
- गीता 1.28 – कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्
- गीता 1.29 – सीदन्ति मम गात्राणि
- गीता 1.30 – गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव
- गीता 1.32 – न काङ्क्षे विजयं
- गीता 1.33 – येषामर्थे काङ्क्षितं नो
- गीता 1.34 – आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव
- गीता 1.35 – एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि
- गीता 1.36 – निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का