श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 14
अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā .
māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te ॥
अर्थ
निश्चय ही मेरी यह त्रिगुणमयी दैवी माया पार करने में अत्यंत कठिन है; परन्तु जो केवल मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं
शब्दार्थ
- दैवी – दिव्य, अलौकिक
- हि – निश्चय ही
- एषा – यह
- गुणमयी – तीनों गुणों से बनी
- मम – मेरी
- माया – माया, भ्रम उत्पन्न करने वाली शक्ति
- दुरत्यया – पार करने में अत्यंत कठिन
- माम् – मुझको
- एव – ही
- ये – जो
- प्रपद्यन्ते – शरण में आते हैं
- मायाम् – माया को
- एताम् – इस
- तरन्ति – पार कर जाते हैं
- ते – वे
अन्वय
हि एषा गुणमयी दैवी मम माया दुरत्यया; ये माम् एव प्रपद्यन्ते, ते एतां मायां तरन्ति ।
व्याख्या
यह श्लोक गीता के सबसे महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, क्योंकि इसमें पहली बार ‘माया’ और उसे पार करने के एकमात्र उपाय — ‘प्रपत्ति’ (शरणागति) — का स्पष्ट उल्लेख है।
भगवान् अपनी माया के तीन विशेषण बताते हैं। पहला — ‘दैवी’, दिव्य। यह माया कोई साधारण भ्रम नहीं, भगवान् की ही अलौकिक शक्ति है; इसलिए इसका प्रभाव भी असाधारण है। दूसरा — ‘गुणमयी’, तीनों गुणों से बनी। यह सत्त्व, रज और तम के रूप में संसार का ताना-बाना बुनती है। तीसरा — ‘दुरत्यया’, पार करने में अत्यंत कठिन। अपनी बुद्धि, शक्ति या साधना के बल पर कोई इस माया को पार नहीं कर सकता, क्योंकि जिस मन और बुद्धि से हम प्रयास करते हैं, वे स्वयं माया के ही अंग हैं। जैसे कोई अपने ही बालों को पकड़कर अपने को ऊपर नहीं उठा सकता।
फिर आता है आशा का संदेश — ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते’ — जो केवल मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं। माया भगवान् की है; इसलिए उसका स्वामी ही उससे मुक्त कर सकता है। जैसे किसी जादूगर के जादू से केवल वही जादूगर मुक्त कर सकता है, या जैसे किसी किले का द्वार केवल उसका स्वामी खोल सकता है। ‘मामेव’ — ‘मुझे ही’ — शब्द अनन्यता पर बल देता है; आधी-अधूरी नहीं, पूर्ण शरणागति।
आचार्य शंकर कहते हैं कि जो सब धर्मों (कर्मों के अहंकार) को त्यागकर अपने आत्मस्वरूप मुझ मायावी की ही सब प्रकार से शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं। आचार्य रामानुज इस श्लोक को प्रपत्ति-सिद्धांत का आधार मानते हैं — भगवान् की कृपा ही माया से मुक्ति का साधन है, और शरणागति उस कृपा को ग्रहण करने का द्वार है। आचार्य मध्व भी भगवान् को ही माया के नियंता और मुक्तिदाता मानते हैं।
इस श्लोक का व्यावहारिक संदेश गहरा है: अपने प्रयास के साथ-साथ विनम्रता भी आवश्यक है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि अकेले हमारे बल से नहीं होगा, और ईश्वर पर पूर्ण भरोसा कर लेते हैं, तभी असली मुक्ति का मार्ग खुलता है।
प्रसंग
7.13 में बताया गया कि तीनों गुणों से मोहित जगत् भगवान् को नहीं जानता। यह श्लोक उस मोह (माया) की प्रकृति और उसे पार करने का उपाय बताता है। अगले श्लोक (7.15) में भगवान् बताते हैं कि कौन लोग उनकी शरण में नहीं आते।
जीवन-शिक्षा
जीवन की कुछ उलझनें केवल अपनी चतुराई से नहीं सुलझतीं। अपने पूरे प्रयास के साथ ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव रखें। ‘मैं ही सब कर लूँगा’ का अहंकार छोड़कर ‘तेरी कृपा से होगा’ की विनम्रता अपनाएँ — यही माया से पार होने की कुंजी है।
मुख्य शब्द
- माया
- भगवान् की वह शक्ति जो जीव को भ्रम में डालती है
- दैवी
- दिव्य, भगवान् की
- दुरत्यया
- पार करने में अत्यंत कठिन
- प्रपत्ति
- पूर्ण शरणागति
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 7.9 – पुण्यो गन्धः पृथिव्यां
- गीता 7.10 – बीजं मां सर्वभूतानां
- गीता 7.11 – बलं बलवतां चाहं
- गीता 7.12 – ये चैव सात्त्विका
- गीता 7.13 – त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
- गीता 7.15 – न मां दुष्कृतिनो
- गीता 7.16 – चतुर्विधा भजन्ते मां
- गीता 7.17 – तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त
- गीता 7.18 – उदाराः सर्व एवैते
- गीता 7.19 – बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां