श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 10
अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
bījaṃ māṃ sarvabhūtānāṃ viddhi pārtha sanātanam .
buddhirbuddhimatāmasmi tejastejasvināmaham ॥
अर्थ
हे पार्थ! मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ
शब्दार्थ
- बीजम् – बीज, मूल कारण
- माम् – मुझको
- सर्वभूतानाम् – सब प्राणियों का
- विद्धि – जानो
- पार्थ – हे पार्थ
- सनातनम् – सनातन, नित्य
- बुद्धिः – बुद्धि
- बुद्धिमताम् – बुद्धिमानों की
- अस्मि – हूँ
- तेजः – तेज, प्रभाव
- तेजस्विनाम् – तेजस्वियों का
- अहम् – मैं
अन्वय
पार्थ, मां सर्वभूतानां सनातनं बीजं विद्धि; अहं बुद्धिमतां बुद्धिः, तेजस्विनां तेजः अस्मि ।
व्याख्या
भगवान् अपने सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन आगे बढ़ाते हुए एक गहरी उपमा देते हैं — ‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि सनातनम्’ — मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। बीज में पूरा वृक्ष सूक्ष्म रूप में छिपा रहता है — जड़, तना, शाखाएँ, पत्ते, फूल, फल। समय आने पर वह प्रकट होता है। उसी प्रकार सारी सृष्टि सूक्ष्म रूप में भगवान् में रहती है और उन्हीं से प्रकट होती है।
‘सनातन’ विशेषण महत्वपूर्ण है। साधारण बीज वृक्ष बनने के बाद नष्ट हो जाता है, और एक बीज से एक ही प्रकार का वृक्ष होता है। पर भगवान् ऐसे बीज हैं जो सदा बने रहते हैं और जिनसे अनंत प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं। आचार्य शंकर कहते हैं कि यह बीज ‘सनातन’ है, अर्थात् अन्य बीजों की तरह नश्वर नहीं।
फिर भगवान् दो और विभूतियाँ बताते हैं। ‘बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि’ — बुद्धिमानों में मैं बुद्धि हूँ। विवेक की वह शक्ति जो सही-गलत, सत्य-असत्य में भेद करती है, भगवान् की ही विभूति है। ‘तेजस्तेजस्विनामहम्’ — तेजस्वियों में मैं तेज हूँ। किसी महान व्यक्ति का प्रभाव, आत्मविश्वास, व्यक्तित्व का आकर्षण — वह भी भगवान् का अंश है।
यह दृष्टि हमें अहंकार से बचाती है। यदि हमारी बुद्धि और प्रभाव भगवान् से आते हैं, तो उन पर गर्व करने के बजाय उन्हें भगवान् की सेवा और लोक-कल्याण में लगाना चाहिए।
प्रसंग
7.8–9 में भगवान् ने जल, अग्नि, पृथ्वी आदि में अपनी उपस्थिति बताई। यहाँ वे स्वयं को सबका सनातन बीज और बुद्धि तथा तेज का स्रोत बताते हैं। अगले श्लोक (7.11) में वे बल और धर्मसम्मत काम के रूप में अपनी विभूति बताते हैं।
जीवन-शिक्षा
आपकी बुद्धि और प्रतिभा ईश्वर का उपहार हैं, आपकी निजी संपत्ति नहीं। उनका उपयोग दूसरों को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सेवा और भलाई के लिए करें। तब वे और भी निखरती हैं।
मुख्य शब्द
- बीज
- मूल कारण, जिससे सब उत्पन्न होता है
- सनातन
- नित्य, जो कभी नष्ट नहीं होता
- बुद्धि
- विवेक-शक्ति
- तेज
- प्रभाव, आत्मबल, कांति
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 7.5 – अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि
- गीता 7.6 – एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
- गीता 7.7 – मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति
- गीता 7.8 – रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि
- गीता 7.9 – पुण्यो गन्धः पृथिव्यां
- गीता 7.11 – बलं बलवतां चाहं
- गीता 7.12 – ये चैव सात्त्विका
- गीता 7.13 – त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
- गीता 7.14 – दैवी ह्येषा गुणमयी
- गीता 7.15 – न मां दुष्कृतिनो