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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 1

अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

śrībhagavānuvāca .
imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam .
vivasvānmanave prāha manurikṣvākave.abravīt ॥

अर्थ

श्रीभगवान ने कहा — मैंने इस अविनाशी योग का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान् (सूर्यदेव) को दिया था; विवस्वान् ने इसे अपने पुत्र मनु को बताया और मनु ने इसे अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को कहा

शब्दार्थ

  • इमम् – इस (पिछले दो अध्यायों में कहे गए)
  • विवस्वते – विवस्वान् अर्थात् सूर्यदेव को
  • योगम् – योग को — ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा रूपी साधना को
  • प्रोक्तवान् – कहा था, उपदेश दिया था
  • अहम् – मैंने
  • अव्ययम् – अविनाशी, जिसका फल कभी नष्ट न हो
  • विवस्वान् – सूर्यदेव ने
  • मनवे – (अपने पुत्र) वैवस्वत मनु को
  • प्राह – कहा
  • मनुः – मनु ने
  • इक्ष्वाकवे – (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु को
  • अब्रवीत् – कहा, उपदेश दिया

अन्वय

श्रीभगवान् उवाच — अहम् इमम् अव्ययं योगं विवस्वते प्रोक्तवान्; विवस्वान् मनवे प्राह; मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत् ।

व्याख्या

चौथे अध्याय का आरम्भ एक अद्भुत घोषणा से होता है। अब तक श्रीकृष्ण अर्जुन के सखा और सारथी के रूप में बोल रहे थे, परन्तु यहाँ वे पहली बार अपने ईश्वरीय स्वरूप का संकेत देते हैं — ‘यह योग मैंने ही सृष्टि के आदि में सूर्यदेव को सिखाया था।’ इस एक वाक्य से गीता का उपदेश किसी एक युद्ध-प्रसंग की सलाह नहीं, बल्कि सनातन ज्ञान-परम्परा का अंग बन जाता है।

‘इमं योगम्’ — कौन-सा योग? आचार्य शंकर के अनुसार यह वही योग है जिसका वर्णन दूसरे और तीसरे अध्याय में हुआ — ज्ञानयोग (सांख्यनिष्ठा) और उसकी प्राप्ति का साधन कर्मयोग। इसे ‘अव्यय’ कहा गया, क्योंकि इसका फल — मोक्ष — कभी नष्ट नहीं होता, और यह ज्ञान स्वयं भी काल से परे है। आचार्य रामानुज इसे आत्म-स्वरूप के ज्ञान से युक्त कर्मयोग मानते हैं, जो भगवान की आराधना का रूप है।

परम्परा का क्रम ध्यान देने योग्य है — भगवान से सूर्य, सूर्य से मनु, मनु से इक्ष्वाकु। सूर्य समस्त जगत को प्रकाश और प्राण देने वाले हैं; मनु मानव-जाति के आदिपुरुष और धर्मशास्त्र के प्रणेता हैं; इक्ष्वाकु सूर्यवंश के प्रथम राजा हैं, जिसमें आगे भगवान श्रीराम का अवतार हुआ। अर्थात् यह ज्ञान आरम्भ से ही शासकों और कर्मशील पुरुषों के लिए था।

इस श्लोक का एक गहरा उद्देश्य यह भी है कि अर्जुन के मन में इस उपदेश के प्रति श्रद्धा जगे। जो ज्ञान अत्यन्त प्राचीन हो, जिसे महान राजाओं ने अपनाया हो और जिसका मूल स्रोत स्वयं परमेश्वर हों, उस पर संदेह का कोई स्थान नहीं रहता। गीता का कर्मयोग कोई नया प्रयोग नहीं, बल्कि युगों से परखा हुआ मार्ग है।

प्रसंग

तीसरे अध्याय के अंत (3.43) में श्रीकृष्ण ने बुद्धि से आत्मा को जानकर काम-रूपी शत्रु को जीतने का उपदेश दिया था। अब चौथे अध्याय के आरम्भ में वे उसी योग की प्राचीनता और परम्परा बताते हैं। अगले श्लोक (4.2) में वे कहते हैं कि यह परम्परा समय के साथ लुप्त हो गई।

जीवन-शिक्षा

जो ज्ञान युगों से परखा गया हो और सच्ची परम्परा से आया हो, उस पर श्रद्धा रखना बुद्धिमानी है। सत्य ज्ञान नया नहीं होता, वह सनातन होता है — हमें केवल उसे पुनः खोजना और अपनाना होता है।

मुख्य शब्द

अव्यय योग
अविनाशी योग, जिसका फल मोक्ष कभी नष्ट नहीं होता
विवस्वान्
सूर्यदेव, वैवस्वत मनु के पिता
मनु
मानव-जाति के आदिपुरुष और धर्म के व्यवस्थापक
इक्ष्वाकु
सूर्यवंश के प्रथम राजा, मनु के पुत्र

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