श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 77
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: संजय
संस्कृत श्लोक
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ .
vismayo me mahān rājanhṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ॥
अर्थ
हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को भी बार-बार स्मरण करके मुझे महान विस्मय हो रहा है, और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
शब्दार्थ
- तत् – उस
- च – और
- संस्मृत्य संस्मृत्य – बार-बार स्मरण करके
- रूपम् – रूप को
- अत्यद्भुतम् – अत्यन्त अद्भुत
- हरेः – श्रीहरि का
- विस्मयः – विस्मय, आश्चर्य
- मे – मुझे
- महान् – महान
- राजन् – हे राजन्
- हृष्यामि – हर्षित होता हूँ
- च – और
- पुनः पुनः – बार-बार
अन्वय
राजन्, हरेः तत् अत्यद्भुतं रूपं च संस्मृत्य संस्मृत्य मे महान् विस्मयः (भवति); (अहं) पुनः पुनः हृष्यामि च ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में सञ्जय ने संवाद — अर्थात् शब्दों — के स्मरण से हर्ष की बात कही थी। अब वे ‘रूप’ — दर्शन — के स्मरण की बात करते हैं। ‘तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः’ — श्रीहरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके। यह ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप-दर्शन की ओर संकेत है, जब भगवान ने अर्जुन को अपना विराट, सहस्रों सूर्यों के समान तेजस्वी, अनन्त मुखों और भुजाओं वाला ब्रह्माण्डीय रूप दिखाया था (11.12)।
सञ्जय उस दर्शन के भी साक्षी थे, क्योंकि व्यास की दिव्य दृष्टि से उन्होंने भी उसे देखा। उसका स्मरण उनमें दो भाव जगाता है। पहला है ‘विस्मयो मे महान्’ — महान विस्मय, आश्चर्य। वह रूप मनुष्य की कल्पना से परे था — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक शरीर में; सृष्टि, स्थिति और संहार एक साथ। ऐसा दर्शन बुद्धि को स्तब्ध कर देता है।
दूसरा भाव है ‘हृष्यामि च पुनः पुनः’ — बार-बार हर्ष। विस्मय के साथ आनन्द भी है, क्योंकि उन्होंने भगवान की महिमा को प्रत्यक्ष देखा। यह भय-मिश्रित आनन्द है — वह भाव जो किसी अनन्त, विराट सत्ता के सामने खड़े होने पर उठता है। ‘हरि’ — जो पापों और दुःखों को हर लेते हैं — यह सम्बोधन इस आनन्द को और गहरा करता है।
इस श्लोक से एक सुन्दर बात स्पष्ट होती है: गीता केवल सुनने का ज्ञान नहीं, बल्कि दर्शन का अनुभव भी है। शब्द (संवाद) और रूप (दर्शन) — दोनों ही भगवान तक पहुँचने के माध्यम हैं। भक्त भगवान के वचनों का भी स्मरण करता है और उनके स्वरूप का भी ध्यान करता है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में सञ्जय ने संवाद के स्मरण से उत्पन्न हर्ष बताया। यह श्लोक भगवान के विश्वरूप के स्मरण से उत्पन्न विस्मय और हर्ष का वर्णन करता है। अगले और अन्तिम श्लोक (18.78) में सञ्जय गीता का अन्तिम निष्कर्ष देते हैं।
जीवन-शिक्षा
ईश्वर की विराटता और सृष्टि के विस्मय पर समय-समय पर चिन्तन करें — यह अहंकार को छोटा और हृदय को बड़ा करता है। आश्चर्य और कृतज्ञता का भाव आध्यात्मिक जीवन को जीवन्त रखता है। भगवान के वचनों के साथ उनके स्वरूप का ध्यान भी भक्ति को गहरा करता है।
मुख्य शब्द
- अत्यद्भुत रूप
- अत्यन्त अद्भुत रूप — विश्वरूप
- हरि
- पापों और दुःखों को हरने वाले — श्रीकृष्ण
- विस्मय
- गहरा आश्चर्य
- विश्वरूप
- भगवान का ब्रह्माण्डीय विराट रूप (अध्याय 11)