भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 72

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

kaccidetacchrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā .
kaccidajñānasammohaḥ pranaṣṭaste dhanañjaya ॥

अर्थ

हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?

शब्दार्थ

  • कच्चित् – क्या (प्रश्नवाचक)
  • एतत् – यह
  • श्रुतम् – सुना गया
  • पार्थ – हे पार्थ
  • त्वया – तुम्हारे द्वारा
  • एकाग्रेण – एकाग्र
  • चेतसा – चित्त से
  • कच्चित् – क्या
  • अज्ञानसम्मोहः – अज्ञान से उत्पन्न मोह
  • प्रनष्टः – पूर्णतः नष्ट हो गया
  • ते – तुम्हारा
  • धनञ्जय – हे धनंजय

अन्वय

पार्थ, कच्चित् त्वया एतत् एकाग्रेण चेतसा श्रुतम्? धनञ्जय, कच्चित् ते अज्ञानसम्मोहः प्रनष्टः?

व्याख्या

गीता का उपदेश अब पूर्ण हो चुका है। भगवान, एक आदर्श गुरु की तरह, अपने शिष्य से दो प्रश्न पूछते हैं। यह गीता में भगवान का अन्तिम वाक्य है। पहला प्रश्न है — ‘कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा’ — क्या तुमने इसे एकाग्र मन से सुना? यह प्रश्न श्रवण की गुणवत्ता के बारे में है। ज्ञान का प्रभाव इस पर निर्भर करता है कि उसे कितनी एकाग्रता और ध्यान से ग्रहण किया गया। बिखरे मन से सुना गया उपदेश हृदय तक नहीं पहुँचता।

दूसरा प्रश्न है — ‘कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय’ — क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ? यह प्रश्न परिणाम के बारे में है। उपदेश का उद्देश्य जानकारी देना नहीं, बल्कि रूपान्तरण है। गीता का आरम्भ अर्जुन के मोह से हुआ था — पहले अध्याय में वह मोह और विषाद से ग्रस्त होकर रथ पर बैठ गया था। अब भगवान देखना चाहते हैं कि क्या वह मोह, जो अज्ञान से उपजा था, पूरी तरह — ‘प्रनष्टः’ — नष्ट हो गया है।

इन प्रश्नों में भगवान का असीम धैर्य और करुणा दिखती है। शंकराचार्य कहते हैं कि भगवान यह इसलिए पूछते हैं कि यदि अर्जुन ने ठीक से नहीं समझा हो, तो वे फिर से समझाने के लिए तैयार हैं। यह शिष्य के प्रति गुरु का दायित्व-बोध है। सच्चा गुरु केवल बोलकर नहीं रुक जाता; वह यह भी देखता है कि शिष्य ने क्या ग्रहण किया।

‘पार्थ’ और ‘धनञ्जय’ — ये दोनों सम्बोधन अर्जुन को उसकी पहचान याद दिलाते हैं: कुन्ती (पृथा) का पुत्र, और धन तथा विजय को जीतने वाला वीर। यह संकेत है कि अब अर्जुन अपने सच्चे स्वरूप और स्वधर्म में लौटने के लिए तैयार है।

प्रसंग

पिछले श्लोकों (18.67–71) में गीता के उपदेश, अध्ययन और श्रवण की महिमा बताई गई। यह श्लोक गीता में भगवान का अन्तिम वचन है, जिसमें वे अर्जुन से उपदेश के प्रभाव के बारे में पूछते हैं। अगले श्लोक (18.73) में अर्जुन का उत्तर है — मोह नष्ट हो गया।

जीवन-शिक्षा

किसी भी ज्ञान को एकाग्र मन से ग्रहण करें, तभी वह हृदय तक पहुँचता है। सीखने का उद्देश्य केवल जानकारी नहीं, बल्कि अपने भीतर परिवर्तन है — स्वयं से पूछें कि क्या आपका भ्रम मिटा। अच्छा शिक्षक केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि यह भी देखता है कि शिष्य ने क्या समझा।

मुख्य शब्द

एकाग्र चेतस्
एकाग्र, ध्यानयुक्त मन
अज्ञानसम्मोह
अज्ञान से उत्पन्न मोह और भ्रम
प्रनष्ट
पूर्णतः नष्ट
कच्चित्
क्या — कोमल प्रश्नवाचक शब्द

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