श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 30
अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye .
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī ॥
अर्थ
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है
शब्दार्थ
- प्रवृत्तिम् – प्रवृत्ति — कर्म-मार्ग, कर्म में लगना
- च – और
- निवृत्तिम् – निवृत्ति — कर्म से निवृत्त होना, संन्यास-मार्ग
- च – और
- कार्याकार्ये – करने योग्य और न करने योग्य को
- भयाभये – भय और अभय (के कारणों) को
- बन्धम् – बन्धन को
- मोक्षम् – मोक्ष को
- च – और
- या – जो
- वेत्ति – जानती है
- बुद्धिः – बुद्धि
- सा – वह
- पार्थ – हे पार्थ
- सात्त्विकी – सात्त्विकी
अन्वय
पार्थ, या बुद्धिः प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च, कार्याकार्ये, भयाभये, बन्धं मोक्षं च वेत्ति, सा सात्त्विकी ।
व्याख्या
सात्त्विक बुद्धि की परिभाषा चार जोड़ों के रूप में दी गई है, और प्रत्येक जोड़ा जीवन के एक महत्त्वपूर्ण निर्णय-क्षेत्र को दर्शाता है। पहला जोड़ा है ‘प्रवृत्ति और निवृत्ति’ — कब कर्म में लगना चाहिए और कब उससे हटना चाहिए। शंकराचार्य इसे कर्म-मार्ग और संन्यास-मार्ग के रूप में भी देखते हैं। सात्त्विक बुद्धि जानती है कि किस व्यक्ति के लिए, किस अवस्था में, कौन-सा मार्ग उचित है।
दूसरा जोड़ा है ‘कार्य और अकार्य’ — क्या करने योग्य है और क्या नहीं। यह देश, काल और परिस्थिति के अनुसार धर्म-अधर्म का विवेक है। तीसरा जोड़ा है ‘भय और अभय’ — किससे डरना चाहिए और किससे नहीं। यह बहुत सूक्ष्म है। सात्त्विक बुद्धि अधर्म, पाप और अपयश से डरती है, पर कर्तव्य-पालन में आने वाले कष्ट या मृत्यु से नहीं डरती। अर्जुन ठीक इसके विपरीत कर रहा था — वह युद्ध रूपी कर्तव्य से डर रहा था और कर्तव्य-त्याग रूपी अधर्म से नहीं।
चौथा और सबसे गहन जोड़ा है ‘बन्ध और मोक्ष’ — क्या बाँधता है और क्या मुक्त करता है। सात्त्विक बुद्धि जानती है कि आसक्ति, अहंकार और अज्ञान बाँधते हैं, और ज्ञान, अनासक्ति और भक्ति मुक्त करते हैं। यह जानना ही आध्यात्मिक जीवन की दिशा तय करता है।
इस श्लोक में ‘वेत्ति’ — जानती है — शब्द केवल सैद्धान्तिक ज्ञान नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्पष्टता का भी सूचक है। सात्त्विक बुद्धि दर्पण की तरह निर्मल होती है, जिसमें स्थिति ठीक वैसी ही दिखती है जैसी वह है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में बुद्धि और धृति के त्रिविध भेद बताने की घोषणा की गई। यह श्लोक सात्त्विक बुद्धि का वर्णन करता है। अगले श्लोक (18.31) में राजस और फिर 18.32 में तामस बुद्धि का वर्णन है।
जीवन-शिक्षा
जीवन में चार प्रश्नों पर स्पष्टता रखें — कब आगे बढ़ना है और कब रुकना है, क्या करना है और क्या नहीं, किससे डरना है और किससे नहीं, और क्या बाँधता है तथा क्या मुक्त करता है। गलत से डरें, कठिन से नहीं। स्पष्ट बुद्धि ही सही जीवन की नींव है।
मुख्य शब्द
- सात्त्विकी बुद्धि
- धर्म-अधर्म, बन्ध-मोक्ष को स्पष्ट जानने वाली बुद्धि
- प्रवृत्ति-निवृत्ति
- कर्म में लगना और कर्म से हटना
- कार्य-अकार्य
- करने योग्य और न करने योग्य
- भय-अभय
- भय के और निर्भयता के वास्तविक कारण
- बन्ध-मोक्ष
- बन्धन और मुक्ति
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 18.25 – अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य
- गीता 18.26 – मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः
- गीता 18.27 – रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः
- गीता 18.28 – अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः
- गीता 18.29 – बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं
- गीता 18.31 – यया धर्ममधर्मं च
- गीता 18.32 – अधर्मं धर्ममिति या
- गीता 18.33 – धृत्या यया धारयते
- गीता 18.34 – यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या
- गीता 18.35 – यया स्वप्नं भयं