भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 28

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko.alasaḥ .
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate ॥

अर्थ

जो कर्ता असंयमी है, असंस्कृत है, अकड़ वाला (घमण्डी) है, धूर्त है, दूसरों की आजीविका का नाश करने वाला है, आलसी है, विषादग्रस्त रहता है और काम को टालता रहता है, वह तामस कहा जाता है

शब्दार्थ

  • अयुक्तः – असंयमी, जिसका मन एकाग्र और अनुशासित नहीं
  • प्राकृतः – असंस्कृत, गँवार, शिक्षा-संस्कार से रहित
  • स्तब्धः – अकड़ वाला, किसी के आगे न झुकने वाला
  • शठः – धूर्त, कपटी
  • नैष्कृतिकः – दूसरों की वृत्ति (आजीविका) का नाश करने वाला, अपमान करने वाला
  • अलसः – आलसी
  • विषादी – सदा उदास और खिन्न रहने वाला
  • दीर्घसूत्री – काम को लम्बा खींचने वाला, टालमटोल करने वाला
  • च – और
  • कर्ता – कर्ता
  • तामसः – तामस
  • उच्यते – कहा जाता है

अन्वय

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठः नैष्कृतिकः अलसः विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामसः उच्यते ।

व्याख्या

तामस कर्ता के आठ लक्षण बताए गए हैं, और ये हमें आत्मनिरीक्षण का अवसर देते हैं। ‘अयुक्तः’ — उसका मन अनुशासित नहीं है; वह किसी कार्य में एकाग्र नहीं हो पाता। ‘प्राकृतः’ — उसमें शिक्षा और संस्कार की कमी है; वह अपनी आदिम प्रवृत्तियों के अनुसार ही चलता है। ‘स्तब्धः’ — वह अकड़ा हुआ है; बड़ों, गुरुओं या उचित सलाह के आगे भी नहीं झुकता।

‘शठः’ — वह धूर्त है; अपनी असली मंशा छिपाकर काम करता है। ‘नैष्कृतिकः’ — वह दूसरों की आजीविका नष्ट करने वाला या उनका अपमान करने वाला है; शंकराचार्य के अनुसार इसका अर्थ है दूसरों के काम बिगाड़ने वाला। ‘अलसः’ — वह आलसी है; करने योग्य कार्य में भी उसकी प्रवृत्ति नहीं होती।

अन्तिम दो लक्षण विशेष ध्यान देने योग्य हैं। ‘विषादी’ — वह सदा उदास, निराश और शिकायत करने वाला रहता है। ‘दीर्घसूत्री’ — वह काम को टालता रहता है; जो काम आज होना चाहिए, उसे महीनों तक खींचता है। शंकराचार्य कहते हैं कि दीर्घसूत्री वह है जो एक दिन के काम को एक महीने में भी पूरा नहीं करता। आज की भाषा में यह ‘प्रोक्रैस्टिनेशन’ है, और गीता इसे स्पष्ट रूप से तमोगुण का लक्षण बताती है।

इस प्रकार तीनों कर्ताओं का क्रम स्पष्ट है: सात्त्विक कर्ता उत्साही और सम है, राजस कर्ता उत्साही पर अशान्त है, और तामस कर्ता न उत्साही है न शान्त — वह जड़ता और नकारात्मकता में डूबा रहता है। यह पहचान कि हमारे भीतर कौन-से लक्षण हैं, उन्हें बदलने का पहला कदम है।

प्रसंग

पिछले दो श्लोकों में सात्त्विक और राजस कर्ता का वर्णन हुआ। यह श्लोक तामस कर्ता का वर्णन करता है। अगले श्लोक (18.29) में भगवान बुद्धि और धृति के तीन-तीन भेद बताने की घोषणा करते हैं।

जीवन-शिक्षा

टालमटोल, आलस्य और निरन्तर शिकायत — ये तमोगुण के लक्षण हैं, जो जीवन को धीरे-धीरे जड़ बना देते हैं। जो काम आज करना है, उसे आज ही आरम्भ करें। विनम्रता से सीखने और अनुशासन अपनाने से तम पर विजय पाई जा सकती है।

मुख्य शब्द

तामस कर्ता
असंयमी, अकड़ वाला, धूर्त, आलसी और टालमटोल करने वाला कर्ता
स्तब्ध
अकड़ वाला, न झुकने वाला
शठ
धूर्त, कपटी
दीर्घसूत्री
काम को टालने और लम्बा खींचने वाला
विषादी
सदा उदास और खिन्न रहने वाला

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