भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 6

अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

karṣayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ .
māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān ॥

अर्थ

वे विवेकहीन लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय (पंचभूतों और इन्द्रियों) को और शरीर के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित मुझको भी कष्ट देते हैं — उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाले जानो

शब्दार्थ

  • कर्षयन्तः – कष्ट देते हुए, कृश करते हुए
  • शरीरस्थम् – शरीर में स्थित
  • भूतग्रामम् – भूतों के समुदाय को (पंचभूत, इन्द्रियाँ)
  • अचेतसः – विवेकहीन, अविचारी
  • माम् – मुझको
  • च एव – और भी
  • अन्तःशरीरस्थम् – शरीर के भीतर स्थित
  • तान् – उन्हें
  • विद्धि – जानो
  • आसुरनिश्चयान् – आसुरी निश्चय (संकल्प) वाले

अन्वय

(ते) अचेतसः शरीरस्थं भूतग्रामम् अन्तःशरीरस्थं मां च एव कर्षयन्तः — तान् आसुरनिश्चयान् विद्धि ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में शास्त्र-विरुद्ध घोर तप करने वालों के भाव बताए गए; यहाँ उनके कर्म और उनका मूल्यांकन बताया गया है। ‘कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम्’ — वे शरीर में स्थित ‘भूतग्राम’ को कष्ट देते हैं। ‘भूतग्राम’ का अर्थ है शरीर को बनाने वाले पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ और प्राण। शरीर कोई शत्रु नहीं, बल्कि साधना का साधन है; उसे अनावश्यक यातना देना उस साधन को ही नष्ट करना है।

इससे भी गम्भीर बात है — ‘मां चैवान्तःशरीरस्थम्’ — वे शरीर के भीतर स्थित मुझको भी कष्ट देते हैं। भगवान् प्रत्येक शरीर में अन्तर्यामी रूप से साक्षी बनकर रहते हैं। जब कोई अहंकार और हठ से अपने शरीर को यातना देता है, तो वह मानो उस परमात्मा का ही अनादर करता है जिसका यह शरीर मन्दिर है। आचार्य शंकर कहते हैं कि भगवान् को कष्ट देने का अर्थ है उनकी आज्ञा, अर्थात् शास्त्र का उल्लंघन करना।

‘अचेतसः’ — ये लोग विवेकहीन हैं। वे सोचते हैं कि शरीर को जितना अधिक कष्ट देंगे, उतनी अधिक सिद्धि मिलेगी, पर वे यह नहीं समझते कि आध्यात्मिक उन्नति मन की शुद्धि से होती है, शरीर के विनाश से नहीं।

‘तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्’ — भगवान् इनका स्पष्ट मूल्यांकन करते हैं: ये ‘आसुरी निश्चय’ वाले हैं। बाहर से वे तपस्वी दिखते हैं, पर उनका संकल्प आसुरी है, क्योंकि वह दम्भ, अहंकार और कामना से उत्पन्न हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि गीता की दृष्टि में किसी साधना का मूल्य उसकी कठोरता से नहीं, उसके भाव और विवेक से तय होता है।

प्रसंग

पिछले श्लोक में शास्त्र-विरुद्ध तप करने वालों के भाव बताए गए; यहाँ उनके कर्म और उनका आसुरी स्वरूप बताया गया है। अगले श्लोक से भगवान् आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन-तीन भेद बताना आरम्भ करते हैं।

जीवन-शिक्षा

शरीर भगवान् का मन्दिर और साधना का साधन है; उसे यातना देना आध्यात्मिकता नहीं। साधना का मूल्य उसकी कठोरता में नहीं, उसके पीछे के भाव और विवेक में है।

मुख्य शब्द

भूतग्राम
शरीर में स्थित पंचभूत, इन्द्रियाँ और प्राण
अन्तःशरीरस्थ
शरीर के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा
आसुरनिश्चय
आसुरी संकल्प वाला

इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक

श्रीकृष्ण से जुड़ी सामग्री

लोकप्रिय गीता श्लोक