श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 5
अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ .
dambhāhaṃkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ ॥
अर्थ
जो लोग दम्भ और अहंकार से युक्त होकर, कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से प्रेरित होकर, शास्त्र-विधि से रहित घोर तप करते हैं —
शब्दार्थ
- अशास्त्रविहितम् – शास्त्र-विधि से रहित, शास्त्र में न बताया गया
- घोरम् – घोर, भयानक
- तप्यन्ते – करते हैं (तप)
- ये – जो
- तपः – तप
- जनाः – लोग
- दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः – दम्भ और अहंकार से युक्त
- कामरागबलान्विताः – कामना, आसक्ति और बल (के अभिमान) से युक्त
अन्वय
ये जनाः दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः अशास्त्रविहितं घोरं तपः तप्यन्ते —
व्याख्या
पिछले श्लोक में भगवान् ने उन लोगों की बात की जो शास्त्र-विधि के बिना भी किसी न किसी श्रद्धा से पूजा करते हैं। अब वे उन लोगों का वर्णन करते हैं जो इससे भी आगे जाकर शास्त्र-विरुद्ध, ‘घोर तप’ करते हैं। यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर एक वाक्य बनाते हैं।
‘अशास्त्रविहितं घोरं तपः’ — ऐसा भयानक तप जो शास्त्र में नहीं बताया गया। जैसे — अनावश्यक रूप से लम्बे उपवास करके शरीर को नष्ट करना, अपने अंगों को कष्ट देना, कठोर मौसम में शरीर को यातना देना, या अन्य ऐसे उपाय जो प्रदर्शन या हठ के लिए किए जाते हैं। गीता छठे अध्याय में ही बता चुकी है कि योग न अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का (6.16); संयम और सन्तुलन ही सच्चा तप है।
ऐसे तप के पीछे की प्रेरणाएँ क्या हैं? ‘दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः’ — दम्भ, अर्थात् लोगों को दिखाने के लिए, और अहंकार, अर्थात् ‘मैं कितना महान् तपस्वी हूँ’ इस भाव से। ‘कामरागबलान्विताः’ — कामना, अर्थात् किसी विशेष फल या सिद्धि की इच्छा; राग, अर्थात् उस फल के प्रति आसक्ति; और बल, अर्थात् अपनी शक्ति का अभिमान या दूसरों को दबाने की शक्ति पाने की लालसा।
इस प्रकार ऐसा तप बाहर से त्याग जैसा दिखता है, पर भीतर से वह अहंकार और कामना से ही भरा होता है। यह आत्मशुद्धि का साधन न होकर अहंकार का ही एक और रूप बन जाता है। अगले श्लोक में भगवान् इसका परिणाम बताते हैं।
प्रसंग
पिछले श्लोक में तीन प्रकार के लोगों के उपास्य बताए गए; यहाँ शास्त्र-विरुद्ध घोर तप करने वालों का वर्णन आरम्भ होता है, जो अगले श्लोक में पूरा होता है।
जीवन-शिक्षा
शरीर को यातना देना या दिखावे के लिए कठोर व्रत करना तप नहीं, अहंकार का ही रूप है। सच्चा तप संयम, सन्तुलन और शुद्ध भाव से किया जाता है।
मुख्य शब्द
- अशास्त्रविहित तप
- शास्त्र में न बताया गया, मनमाना तप
- घोर तप
- शरीर को अनावश्यक यातना देने वाला तप
- कामरागबल
- कामना, आसक्ति और शक्ति का अभिमान
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 17.1 – अर्जुन उवाच
- गीता 17.2 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 17.3 – सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा
- गीता 17.4 – यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि
- गीता 17.6 – कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः
- गीता 17.7 – आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो
- गीता 17.8 – आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः
- गीता 17.9 – कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः
- गीता 17.10 – यातयामं गतरसं पूति
- गीता 17.11 – अफलाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य