भगवद् गीता वर्ल्ड

मत्स्य अवतार

प्रलय के समय भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके राजा सत्यव्रत, सप्तर्षियों और वेदों की रक्षा की।

मत्स्य भगवान विष्णु का पहला अवतार है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, एक महान युग के अंत में धर्मात्मा राजा सत्यव्रत नदी में पितरों को जल अर्पित कर रहे थे, तभी उनकी अंजलि में एक छोटी-सी मछली आ गई और उसने रक्षा की प्रार्थना की। राजा ने उसे पहले एक पात्र में, फिर तालाब में और फिर सरोवर में रखा, परंतु मछली बढ़ती ही गई, यहाँ तक कि समुद्र भी उसके लिए छोटा पड़ने लगा। सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं, और उन्होंने भगवान को प्रणाम किया।

भगवान ने बताया कि सात दिन बाद तीनों लोक प्रलय के जल में डूब जाएँगे। उनके पास एक विशाल नौका आएगी, जिसमें वे सप्तर्षियों, सब प्रकार की औषधियों, बीजों और जीवों के साथ बैठें। जब जल बढ़ा, तब भगवान एक सींग वाली स्वर्णिम विशाल मछली के रूप में प्रकट हुए। वासुकि नाग को रस्सी बनाकर नौका उनके सींग से बाँधी गई, और प्रलय की लंबी रात में भगवान ने राजा को परम ज्ञान का उपदेश दिया। मत्स्य भगवान ने उस हयग्रीव असुर का भी वध किया, जिसने वेद चुरा लिए थे, और वेद ब्रह्मा जी को लौटा दिए। आगे चलकर सत्यव्रत ही वैवस्वत मनु बने।

मत्स्य अवतार की शिक्षा है कि भगवान ज्ञान की रक्षा करते हैं और उन लोगों की रक्षा करते हैं जो असहायों की रक्षा करते हैं। एक छोटी मछली पर दिखाई गई दया ही राजा के लिए भगवत्कृपा का द्वार बन गई।

Number
1
Yuga
सत्ययुग
Form
मछली
Source
Shrimad Bhagavatam, Canto 8, ch. 24

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