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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 20

अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

kāmaistaistairhṛtajñānāḥ prapadyante.anyadevatāḥ .
taṃ taṃ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā ॥

अर्थ

विभिन्न कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे लोग अपने-अपने स्वभाव से प्रेरित होकर, उन-उन नियमों का पालन करते हुए अन्य देवताओं की शरण लेते हैं

शब्दार्थ

  • कामैः – कामनाओं द्वारा
  • तैः तैः – उन-उन (विभिन्न)
  • हृतज्ञानाः – जिनका ज्ञान हर लिया गया
  • प्रपद्यन्ते – शरण लेते हैं
  • अन्यदेवताः – अन्य देवताओं की
  • तम् तम् – उस-उस
  • नियमम् – नियम, विधि
  • आस्थाय – पालन करके, अपनाकर
  • प्रकृत्या – स्वभाव से
  • नियताः – प्रेरित, बँधे हुए
  • स्वया – अपने

अन्वय

तैः तैः कामैः हृतज्ञानाः (जनाः) स्वया प्रकृत्या नियताः तं तं नियमम् आस्थाय अन्यदेवताः प्रपद्यन्ते ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में भगवान् ने उस दुर्लभ महात्मा का वर्णन किया जो ‘वासुदेवः सर्वम्’ जानकर उनकी शरण लेता है। अब वे बताते हैं कि अधिकांश लोग ऐसा क्यों नहीं करते और अन्य मार्गों पर क्यों चलते हैं।

‘कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः’ — विभिन्न कामनाओं ने उनका विवेक हर लिया है। किसी को धन चाहिए, किसी को संतान, किसी को रोग से मुक्ति, किसी को शत्रु पर विजय, किसी को स्वर्ग। ये कामनाएँ इतनी प्रबल होती हैं कि वे परम सत्य की खोज को ढक देती हैं। व्यक्ति सोचता है — मुझे भगवान् से क्या, मुझे तो बस यह एक चीज़ चाहिए।

ऐसे लोग ‘प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः’ — अन्य देवताओं की शरण लेते हैं, यह सोचकर कि अमुक देवता अमुक फल शीघ्र देंगे। वे ‘तं तं नियममास्थाय’ — उस-उस देवता की पूजा के विशेष नियम, व्रत, अनुष्ठान अपनाते हैं। और यह सब वे ‘प्रकृत्या नियताः स्वया’ — अपने स्वभाव और पूर्व संस्कारों से प्रेरित होकर करते हैं। आचार्य शंकर कहते हैं कि ‘प्रकृति’ का अर्थ है पूर्वजन्मों में अर्जित संस्कार-विशेष।

यह ध्यान देने योग्य है कि भगवान् यहाँ देवताओं की निंदा नहीं करते। देवता भी भगवान् की ही शक्तियाँ और विभूतियाँ हैं। समस्या उपासना में नहीं, उसके पीछे के उद्देश्य में है — जब पूजा केवल सीमित सांसारिक फल के लिए हो और परम सत्य की उपेक्षा हो। अगले श्लोकों में भगवान् बताते हैं कि वे ऐसे उपासकों के साथ भी कितनी उदारता से व्यवहार करते हैं।

प्रसंग

7.19 में ‘वासुदेवः सर्वम्’ जानने वाले दुर्लभ महात्मा का वर्णन था। यह श्लोक उन लोगों के बारे में है जो कामनाओं के कारण अन्य देवताओं की उपासना करते हैं। अगले श्लोक (7.21) में भगवान् कहते हैं कि वे ऐसे भक्तों की श्रद्धा को भी स्थिर करते हैं।

जीवन-शिक्षा

अपनी प्रार्थनाओं और पूजा के पीछे के उद्देश्य को परखें। क्या आप केवल कुछ पाने के लिए ईश्वर के पास जाते हैं? माँगना गलत नहीं, पर उससे आगे बढ़कर ईश्वर को ही चाहना सीखें — तभी पूजा सच्चे ज्ञान का द्वार बनती है।

मुख्य शब्द

हृतज्ञान
जिसका विवेक (कामनाओं ने) हर लिया
अन्यदेवता
परमेश्वर से भिन्न मानकर पूजे जाने वाले देवता
नियम
उपासना की विशेष विधि, व्रत, अनुष्ठान
प्रकृति
स्वभाव, पूर्वजन्म के संस्कार

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