श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 43
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam .
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ॥
अर्थ
हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्वजन्म में प्राप्त किए गए बुद्धि-संयोग (योग-संस्कार) को फिर से प्राप्त कर लेता है, और उसके बल से वह पूर्ण सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है
शब्दार्थ
- तत्र – वहाँ
- तम् – उस
- बुद्धिसंयोगम् – बुद्धि के संयोग को, योग-संस्कार को
- लभते – प्राप्त करता है
- पौर्वदेहिकम् – पूर्व शरीर (पिछले जन्म) में अर्जित
- यतते – प्रयत्न करता है
- च – और
- ततः – उसके बाद, उससे
- भूयः – फिर से, और अधिक
- संसिद्धौ – पूर्ण सिद्धि के लिए
- कुरुनन्दन – हे कुरुवंश को आनंद देने वाले
अन्वय
कुरुनन्दन, तत्र (सः) तं पौर्वदेहिकं बुद्धिसंयोगं लभते; ततः च भूयः संसिद्धौ यतते ।
व्याख्या
पवित्र या योगियों के परिवार में जन्म लेने के बाद योगभ्रष्ट साधक के साथ क्या होता है? भगवान् कहते हैं कि वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा शून्य से आरम्भ नहीं करता; जहाँ छोड़ी थी, वहीं से फिर आरम्भ करता है।
‘तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्’ — वह पिछले शरीर में अर्जित बुद्धि-संयोग को फिर प्राप्त करता है। ‘बुद्धिसंयोग’ का अर्थ है योग में लगी हुई बुद्धि, आध्यात्मिक समझ और संस्कार। जैसे कोई यात्री रात को सराय में विश्राम करके अगली सुबह फिर उसी स्थान से यात्रा शुरू करता है, वैसे ही मृत्यु एक विश्राम है, और नया जन्म उसी यात्रा का अगला चरण। आचार्य शंकर कहते हैं कि वह पूर्व शरीर में हुई योग-बुद्धि से फिर जुड़ जाता है।
यही कारण है कि हम संसार में कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जिनमें बहुत छोटी आयु से ही आध्यात्मिक रुचि, वैराग्य या ध्यान की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। भारतीय परम्परा में इसे पूर्वजन्म के संस्कारों का परिणाम माना जाता है। ऐसे बालकों को शास्त्र या साधना सिखाने में बहुत कम परिश्रम लगता है, क्योंकि वे वास्तव में पुराना पाठ दोहरा रहे होते हैं।
‘यतते च ततो भूयः संसिद्धौ’ — और फिर वह पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है। पिछली बार की अधूरी यात्रा का अनुभव उसे और अधिक दृढ़ बनाता है। आचार्य रामानुज कहते हैं कि वह जैसे नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने अधूरे काम को फिर से आरम्भ करता है, वैसे ही योग में प्रवृत्त होता है।
प्रसंग
6.41–42 में योगभ्रष्ट के अनुकूल परिवार में जन्म की बात थी। यह श्लोक बताता है कि वहाँ उसे पूर्वजन्म के संस्कार फिर मिलते हैं। अगले श्लोक (6.44) में बताया गया है कि वह पूर्व अभ्यास उसे अनायास योग की ओर खींच लेता है।
जीवन-शिक्षा
जीवन में आज जो अच्छे संस्कार और ज्ञान आप अर्जित कर रहे हैं, वे कभी नष्ट नहीं होंगे। आध्यात्मिक प्रगति एक संचित पूँजी है; जहाँ भी, जब भी आप होंगे, वह आपके साथ रहेगी।
मुख्य शब्द
- बुद्धिसंयोग
- योग में लगी बुद्धि और आध्यात्मिक संस्कार
- पौर्वदेहिक
- पिछले शरीर (जन्म) से सम्बन्धित
- संसिद्धि
- पूर्ण सिद्धि, मोक्ष
- कुरुनन्दन
- कुरुवंश को आनंद देने वाले — अर्जुन
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.38 – कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति
- गीता 6.39 – एतन्मे संशयं कृष्ण
- गीता 6.40 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 6.41 – प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा
- गीता 6.42 – अथवा योगिनामेव कुले
- गीता 6.44 – पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते
- गीता 6.45 – प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः
- गीता 6.46 – तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि
- गीता 6.47 – योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना