श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 28
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ .
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnute ॥
अर्थ
इस प्रकार निरंतर अपने मन को (परमात्मा में) लगाता हुआ पापरहित योगी सहज ही ब्रह्म के संस्पर्श रूप अनंत सुख का अनुभव करता है
शब्दार्थ
- युञ्जन् – लगाते हुए
- एवम् – इस प्रकार
- सदा – निरंतर
- आत्मानम् – मन को
- योगी – योगी
- विगतकल्मषः – पापों से रहित हुआ
- सुखेन – सहज ही, सुखपूर्वक
- ब्रह्मसंस्पर्शम् – ब्रह्म के स्पर्श से उत्पन्न
- अत्यन्तम् – अनंत, परम
- सुखम् – सुख को
- अश्नुते – अनुभव करता है, भोगता है
अन्वय
एवं सदा आत्मानं युञ्जन् विगतकल्मषः योगी सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शम् अत्यन्तं सुखम् अश्नुते ।
व्याख्या
यह श्लोक 6.15 के समान ही आरम्भ होता है — ‘युञ्जन्नेवं सदात्मानम्’ — पर वहाँ फल ‘शांति’ बताया गया था, यहाँ फल ‘आनंद’ बताया गया है। शांति और आनंद एक ही अनुभव के दो पहलू हैं — एक नकारात्मक दृष्टि से (सब अशांति का अभाव), दूसरा सकारात्मक दृष्टि से (पूर्ण आनंद की उपस्थिति)।
इस श्लोक का एक सुंदर शब्द है ‘सुखेन’ — सहज ही, बिना कठिनाई के। आरम्भ में ध्यान कठिन लगता है; मन विरोध करता है, शरीर बेचैन होता है। पर जब पाप और मल (कल्मष) धुल जाते हैं, तो वही ध्यान सहज और आनंदमय हो जाता है। जो पहले संघर्ष था, वह अब स्वभाव बन जाता है। यह अभ्यास की परिपक्वता का लक्षण है।
दूसरा अद्भुत शब्द है ‘ब्रह्मसंस्पर्श’ — ब्रह्म का स्पर्श। इन्द्रियों के सुख विषयों के स्पर्श (मात्रास्पर्श, 2.14; 5.22) से आते हैं और दुःख के कारण बनते हैं। इसके विपरीत, यह सुख ब्रह्म के स्पर्श से आता है — अनंत से संपर्क का आनंद। आचार्य शंकर इसका अर्थ करते हैं — परब्रह्म के संस्पर्श से होने वाला, ‘अत्यन्त’ अर्थात् जिसका अंत नहीं। आचार्य रामानुज के अनुसार यह ब्रह्म के अनुभव रूप सुख है, जो शुद्ध आत्म-दर्शन से मिलता है।
इस प्रकार 6.27–28 में ध्यान की यात्रा का शिखर है — शांत मन, निर्मल हृदय, और ब्रह्म से सहज संपर्क का अनंत आनंद। अब आगे के श्लोकों में भगवान् बताएँगे कि ऐसा योगी संसार को कैसे देखता है।
प्रसंग
6.27 में शांत, निर्मल योगी को उत्तम सुख प्राप्त होना बताया गया; यह श्लोक उस सुख को ‘ब्रह्मसंस्पर्श’ कहकर उसकी दिव्यता बताता है। अगले श्लोकों (6.29–32) में ऐसे योगी की समदृष्टि — सब भूतों में आत्मा का दर्शन — बताई गई है।
जीवन-शिक्षा
जो काम आज कठिन लगता है, वही नियमित अभ्यास से कल सहज और आनंदमय बन जाता है। ध्यान में आरम्भिक संघर्ष से घबराएँ नहीं; मन की शुद्धि के साथ आनंद अपने-आप प्रकट होगा।
मुख्य शब्द
- विगतकल्मष
- पापों और मल से मुक्त
- ब्रह्मसंस्पर्श
- ब्रह्म का स्पर्श, ब्रह्म-अनुभूति
- अत्यन्त सुख
- अनंत आनंद
- सुखेन
- सहज रूप से, बिना कठिनाई
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.23 – तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं
- गीता 6.24 – सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः
- गीता 6.25 – शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या
- गीता 6.26 – यतो यतो निश्चरति
- गीता 6.27 – प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं
- गीता 6.29 – सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
- गीता 6.30 – यो मां पश्यति
- गीता 6.31 – सर्वभूतस्थितं यो मां
- गीता 6.32 – आत्मौपम्येन सर्वत्र समं
- गीता 6.33 – अर्जुन उवाच