श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 22
अध्याय 6 – आत्मसंयमयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yaṃ labdhvā cāparaṃ lābhaṃ manyate nādhikaṃ tataḥ .
yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate ॥
अर्थ
जिस लाभ को प्राप्त करके योगी उससे बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह भारी से भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता —
शब्दार्थ
- यम् – जिसको
- लब्ध्वा – प्राप्त करके
- च – और
- अपरम् – दूसरा
- लाभम् – लाभ को
- मन्यते – मानता है
- न – नहीं
- अधिकम् – अधिक, बढ़कर
- ततः – उससे
- यस्मिन् – जिसमें
- स्थितः – स्थित होकर
- दुःखेन – दुःख से
- गुरुणा – भारी, बड़े
- अपि – भी
- विचाल्यते – विचलित किया जाता है
अन्वय
यं लब्ध्वा च ततः अधिकम् अपरं लाभं न मन्यते, यस्मिन् स्थितः गुरुणा अपि दुःखेन न विचाल्यते —
व्याख्या
योग की परम अवस्था के वर्णन में भगवान् दो और कसौटियाँ जोड़ते हैं — एक लाभ के विषय में, दूसरी दुःख के विषय में।
पहली कसौटी — ‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः’ — जिसे पाकर व्यक्ति उससे बड़ा कोई लाभ नहीं मानता। संसार में हर उपलब्धि के बाद मन अगली उपलब्धि की ओर दौड़ता है; एक घर मिला तो बड़ा घर चाहिए, एक पद मिला तो ऊँचा पद। यह दौड़ इसलिए कभी नहीं रुकती क्योंकि कोई भी सांसारिक लाभ पूर्ण नहीं है। पर जब आत्मा का आनंद मिलता है, तो खोज समाप्त हो जाती है — क्योंकि यह पूर्ण है, इससे आगे कुछ नहीं।
दूसरी कसौटी — ‘यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’ — जिसमें स्थित होकर भारी दुःख भी उसे नहीं डिगाता। ‘गुरुणा अपि’ — भारी से भारी, जैसे प्रियजन का वियोग, गंभीर रोग, बड़ी हानि। आचार्य शंकर उदाहरण देते हैं — शस्त्र के आघात जैसे तीव्र दुःख भी। इसका अर्थ यह नहीं कि योगी को पीड़ा का अनुभव नहीं होता; शरीर और मन को पीड़ा होती है, पर उसकी आत्म-स्थिति नहीं डगमगाती। जैसे गहरे समुद्र की सतह पर तूफ़ान हो, पर उसकी गहराई शांत रहती है।
ये दोनों कसौटियाँ साधक के लिए आत्म-परीक्षण का साधन हैं। यदि ध्यान का अनुभव होते हुए भी मन अन्य लाभों के लिए ललचाता है या छोटे दुःख से टूट जाता है, तो समझना चाहिए कि अभी उस अवस्था में स्थिरता नहीं आई।
प्रसंग
6.21 में अतीन्द्रिय सुख का वर्णन था। यह श्लोक उसकी पूर्णता (उससे बड़ा कोई लाभ नहीं) और दृढ़ता (बड़े दुःख में भी अविचल) बताता है। अगले श्लोक (6.23) में इस पूरे वर्णन का निष्कर्ष है — ‘इसी को योग जानो।’
जीवन-शिक्षा
जीवन में बहुत-सी उपलब्धियाँ आती-जाती हैं, पर कोई भी स्थायी तृप्ति नहीं देती। आंतरिक शांति को सबसे बड़ा लाभ मानें; यही वह सहारा है जो कठिनतम समय में भी आपको टूटने नहीं देगा।
मुख्य शब्द
- परम लाभ
- जिससे बड़ा कोई लाभ न हो — आत्म-प्राप्ति
- गुरु दुःख
- भारी, तीव्र दुःख
- विचाल्यते
- डिगाया जाता है, विचलित होता है
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 6.17 – युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
- गीता 6.18 – यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते
- गीता 6.19 – यथा दीपो निवातस्थो
- गीता 6.20 – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं
- गीता 6.21 – सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्
- गीता 6.23 – तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं
- गीता 6.24 – सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः
- गीता 6.25 – शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या
- गीता 6.26 – यतो यतो निश्चरति
- गीता 6.27 – प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं