श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 26
अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
sadbhāve sādhubhāve ca sadityetatprayujyate .
praśaste karmaṇi tathā sacchabdaḥ pārtha yujyate ॥
अर्थ
हे पार्थ! ‘सत्’ — यह शब्द सत्ता (अस्तित्व) के अर्थ में और साधुता (श्रेष्ठता) के अर्थ में प्रयोग किया जाता है; और इसी प्रकार प्रशंसनीय (शुभ) कर्म के लिए भी ‘सत्’ शब्द का प्रयोग होता है
शब्दार्थ
- सद्भावे – सत्ता के अर्थ में, अस्तित्व के भाव में
- साधुभावे – साधुता, श्रेष्ठता के अर्थ में
- च – और
- सत् – ‘सत्’
- इति – इस प्रकार
- एतत् – यह (शब्द)
- प्रयुज्यते – प्रयोग किया जाता है
- प्रशस्ते – प्रशंसनीय, शुभ
- कर्मणि – कर्म में
- तथा – उसी प्रकार
- सच्छब्दः – ‘सत्’ शब्द
- पार्थ – हे पार्थ
- युज्यते – प्रयुक्त होता है
अन्वय
पार्थ, सद्भावे साधुभावे च ‘सत्’ इति एतत् प्रयुज्यते; तथा प्रशस्ते कर्मणि (अपि) सत्-शब्दः युज्यते ।
व्याख्या
‘ॐ’ और ‘तत्’ के बाद अब भगवान् तीसरे शब्द ‘सत्’ का अर्थ और प्रयोग बताते हैं। ‘सत्’ शब्द संस्कृत के सबसे समृद्ध शब्दों में से एक है, और इस श्लोक में भगवान् इसके तीन अर्थ बताते हैं।
पहला — ‘सद्भावे’ — सत्ता या अस्तित्व के अर्थ में। ‘सत्’ का मूल अर्थ है ‘जो है’, जो वास्तविक है। आचार्य शंकर उदाहरण देते हैं: जैसे ‘किसी के पुत्र नहीं था, अब पुत्र हुआ है’ — इस अस्तित्व-बोध के लिए ‘सत्’ का प्रयोग होता है। परम अर्थ में, केवल ब्रह्म ही पूर्ण रूप से ‘सत्’ है, क्योंकि वही कभी नष्ट नहीं होता।
दूसरा — ‘साधुभावे’ — साधुता या श्रेष्ठता के अर्थ में। जब कोई व्यक्ति दुराचार छोड़कर सदाचारी बनता है, तो उसे ‘सत्पुरुष’ कहा जाता है। ‘सज्जन’, ‘सत्संग’, ‘सदाचार’ — इन सब शब्दों में ‘सत्’ इसी अर्थ में है। जो अच्छा है, वह ‘सत्’ है।
तीसरा — ‘प्रशस्ते कर्मणि’ — प्रशंसनीय, शुभ कर्म के अर्थ में। विवाह, यज्ञ, दान जैसे मंगल कार्यों को ‘सत्कर्म’ कहा जाता है।
इन तीनों अर्थों में एक गहरा सम्बन्ध है। जो शुद्ध रूप से ‘है’ (ब्रह्म), वही परम ‘श्रेष्ठ’ है, और जो कर्म उसकी ओर ले जाता है, वही ‘शुभ’ है। इस प्रकार ‘सत्’ शब्द अस्तित्व, नैतिकता और कर्म — तीनों को एक सूत्र में बाँध देता है। जब कोई अपने कर्म को ‘सत्’ कहता है, तो वह उसे सत्य, श्रेष्ठता और परम अस्तित्व से जोड़ देता है।
प्रसंग
पिछले श्लोक में ‘तत्’ का प्रयोग बताया गया; यहाँ ‘सत्’ के अर्थ बताए गए हैं। अगले श्लोक में ‘सत्’ के और प्रयोग बताए गए हैं — यज्ञ, तप और दान में दृढ़ता के लिए भी।
जीवन-शिक्षा
‘सत्’ का अर्थ है सत्य, श्रेष्ठता और शुभ कर्म — तीनों एक साथ। अपने जीवन में इन तीनों को एकरूप करें: सत्य पर टिकें, सदाचार अपनाएँ और शुभ कर्म करें।
मुख्य शब्द
- सत्
- अस्तित्व, साधुता और शुभ कर्म — तीनों का बोधक शब्द
- सद्भाव
- सत्ता, अस्तित्व का भाव
- साधुभाव
- साधुता, श्रेष्ठता, सदाचार
- प्रशस्त कर्म
- प्रशंसनीय, मंगल कर्म
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 17.21 – यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य
- गीता 17.22 – अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते
- गीता 17.23 – ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः
- गीता 17.24 – तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः
- गीता 17.25 – तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः
- गीता 17.27 – यज्ञे तपसि दाने
- गीता 17.28 – अश्रद्धया हुतं दत्तं