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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 6

अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

dvau bhūtasargau loke.asmindaiva āsura eva ca .
daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu ॥

अर्थ

हे पार्थ! इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है — दैवी और आसुरी। दैवी (स्वभाव) का विस्तार से वर्णन हो चुका; अब आसुरी (स्वभाव) के विषय में मुझसे सुनो

शब्दार्थ

  • द्वौ – दो
  • भूतसर्गौ – प्राणियों की सृष्टियाँ, स्वभाव के प्रकार
  • लोके – लोक में
  • अस्मिन् – इस
  • दैवः – दैवी
  • आसुरः – आसुरी
  • एव च – और
  • दैवः – दैवी (स्वभाव)
  • विस्तरशः – विस्तार से
  • प्रोक्तः – कहा गया
  • आसुरम् – आसुरी (स्वभाव) को
  • पार्थ – हे पृथापुत्र
  • मे – मुझसे
  • शृणु – सुनो

अन्वय

पार्थ, अस्मिन् लोके दैवः आसुरः एव च (इति) द्वौ भूतसर्गौ (स्तः) । दैवः विस्तरशः प्रोक्तः; आसुरं मे शृणु ।

व्याख्या

भगवान् कहते हैं कि इस संसार में दो प्रकार के ‘भूतसर्ग’ हैं — दैवी और आसुरी। ‘भूतसर्ग’ का अर्थ है प्राणियों का सृजन या प्रकार। यहाँ इसका अभिप्राय दो भिन्न जातियों से नहीं, बल्कि दो प्रकार की मनोवृत्तियों और जीवन-दिशाओं से है। एक ही परिवार में, बल्कि एक ही व्यक्ति के भीतर भी, ये दोनों प्रवृत्तियाँ मिल सकती हैं; जो प्रबल होती है, उसी से व्यक्ति का स्वभाव पहचाना जाता है।

भगवान् कहते हैं कि दैवी स्वभाव का वर्णन ‘विस्तरशः’ — विस्तार से — हो चुका है। केवल इस अध्याय के पहले तीन श्लोकों में ही नहीं, बल्कि पूरी गीता में — स्थितप्रज्ञ (अध्याय 2), योगी (अध्याय 6), भक्त (अध्याय 12), ज्ञानी (अध्याय 13) और गुणातीत (अध्याय 14) के लक्षणों में — दैवी स्वभाव का ही विस्तृत चित्र है।

आसुरी स्वभाव का संक्षिप्त उल्लेख चौथे श्लोक में हुआ था, पर अब भगवान् उसे विस्तार से बताएँगे। प्रश्न उठता है कि बुरे स्वभाव का विस्तृत वर्णन क्यों? आचार्य शंकर इसका उत्तर देते हैं — ताकि साधक उसे भली-भाँति पहचानकर त्याग सके। रोग को जाने बिना उसका उपचार सम्भव नहीं। जो व्यक्ति आसुरी वृत्तियों के सूक्ष्म रूपों को पहचान लेता है, वही उनसे बच सकता है।

अगले बारह श्लोकों (7–18) में आसुरी स्वभाव का जो चित्र आएगा, वह अत्यन्त सजीव और मनोवैज्ञानिक है। उसमें आसुरी व्यक्ति के विश्वास, इच्छाएँ, सोचने का ढंग और कर्म — सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है।

प्रसंग

पिछले श्लोक में दोनों सम्पत्तियों के फल बताए गए; यहाँ भगवान् आसुरी स्वभाव के विस्तृत वर्णन की भूमिका बनाते हैं। अगले श्लोक से वह वर्णन आरम्भ होता है।

जीवन-शिक्षा

अच्छाई को अपनाने के साथ-साथ बुराई के सूक्ष्म रूपों को पहचानना भी आवश्यक है। जो अपने दोषों को ठीक-ठीक पहचानता है, वही उनसे सचमुच मुक्त हो सकता है।

मुख्य शब्द

भूतसर्ग
प्राणियों की सृष्टि; यहाँ स्वभाव के दो प्रकार
दैव और आसुर
मोक्ष की ओर ले जाने वाला और बन्धन में डालने वाला स्वभाव

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