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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 23

अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartate kāmakārataḥ .
na sa siddhimavāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim ॥

अर्थ

जो व्यक्ति शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त करता है, न सुख को, और न परम गति को

शब्दार्थ

  • यः – जो
  • शास्त्रविधिम् – शास्त्र की विधि को
  • उत्सृज्य – त्यागकर
  • वर्तते – आचरण करता है
  • कामकारतः – अपनी कामना से, मनमाने ढंग से
  • न – नहीं
  • सः – वह
  • सिद्धिम् – सिद्धि को, पूर्णता को
  • अवाप्नोति – प्राप्त करता है
  • न सुखम् – न सुख को
  • न पराम् गतिम् – न परम गति को

अन्वय

यः शास्त्रविधिम् उत्सृज्य कामकारतः वर्तते, सः न सिद्धिम् अवाप्नोति, न सुखं, न परां गतिम् ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में भगवान् ने कहा कि काम, क्रोध और लोभ से मुक्त व्यक्ति अपने कल्याण का आचरण करता है। पर प्रश्न उठता है — ‘कल्याण’ क्या है, यह कौन तय करेगा? हमारा मन, जो स्वयं इन्हीं दोषों से प्रभावित रहता है? इसका उत्तर इस श्लोक और अगले श्लोक में दिया गया है: शास्त्र।

‘शास्त्रविधिमुत्सृज्य’ — शास्त्र की विधि को छोड़कर। ‘शास्त्र’ का अर्थ है वे ग्रन्थ जो ऋषियों के गहन अनुभव और साक्षात्कार से प्राप्त सत्य को मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं — वेद, उपनिषद्, स्मृतियाँ और स्वयं गीता। ‘विधि’ का अर्थ है वे नियम जो बताते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

‘वर्तते कामकारतः’ — जो अपनी कामना के अनुसार, मनमाने ढंग से आचरण करता है। यहाँ मूल समस्या ‘कामकार’ है — केवल अपनी रुचि, सुविधा और इच्छा को ही कसौटी बनाना। यह ठीक वही दृष्टि है जो आसुरी स्वभाव में दिखाई गई थी (16.7) — प्रवृत्ति और निवृत्ति का ज्ञान न होना।

ऐसे व्यक्ति को तीन चीज़ें नहीं मिलतीं। ‘न सिद्धिम्’ — कोई आध्यात्मिक सिद्धि या पूर्णता नहीं, अर्थात् अन्तःकरण की शुद्धि और पुरुषार्थ की योग्यता नहीं। ‘न सुखम्’ — इस लोक में सच्चा सुख और शान्ति नहीं। ‘न परां गतिम्’ — परलोक में परम गति, मोक्ष नहीं। आश्चर्य की बात यह है कि जो व्यक्ति सुख के लिए ही मनमानी करता है, उसे वही सुख नहीं मिलता।

यह श्लोक अन्धश्रद्धा का समर्थन नहीं करता। भगवान् यहाँ कामना से प्रेरित मनमानी का विरोध कर रहे हैं, विचारशील विवेक का नहीं। स्वयं गीता अर्जुन को प्रश्न पूछने और सोचने का पूरा अवसर देती है, और अन्त में कहती है — ‘विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु’ (18.63) — ‘इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहो वैसा करो।’ शास्त्र का प्रमाण और व्यक्ति का विवेक — दोनों मिलकर ही सही मार्ग दिखाते हैं।

साथ ही, यह श्लोक आधुनिक युग की एक बड़ी चुनौती की ओर संकेत करता है। जब हर व्यक्ति केवल ‘मुझे जो अच्छा लगे’ को ही नैतिकता मान लेता है, तो समाज में कोई साझा मूल्य नहीं बचते। शास्त्र वह साझी धरोहर है जो पीढ़ियों के अनुभव को सुरक्षित रखती है।

प्रसंग

पिछले श्लोक में तीन दोषों से मुक्त होकर कल्याण का आचरण करने की बात कही गई; यह श्लोक बताता है कि मनमाना आचरण, जो शास्त्र-विधि की उपेक्षा करता है, किसी फल तक नहीं ले जाता। अगला श्लोक इसका निष्कर्ष है — शास्त्र को ही प्रमाण मानो।

जीवन-शिक्षा

केवल अपनी इच्छा और सुविधा को सही-गलत का मापदण्ड बनाने से न शान्ति मिलती है, न उन्नति। ऋषियों के अनुभव से प्राप्त मार्गदर्शन को अपने विवेक के साथ जोड़कर चलें।

मुख्य शब्द

शास्त्रविधि
शास्त्रों में बताए गए कर्तव्य और निषेध के नियम
कामकार
कामना से प्रेरित, मनमाना आचरण
सिद्धि
आध्यात्मिक पूर्णता, अन्तःकरण की शुद्धि

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