श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 15
अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
āḍhyo.abhijanavānasmi ko.anyo.asti sadṛśo mayā .
yakṣye dāsyāmi modiṣya ityajñānavimohitāḥ ॥
अर्थ
‘मैं धनवान् हूँ, बड़े कुल वाला हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आनन्द मनाऊँगा’ — इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं
शब्दार्थ
- आढ्यः – धनवान्
- अभिजनवान् – उच्च कुल वाला, बड़े परिवार वाला
- अस्मि – हूँ
- कः – कौन
- अन्यः – दूसरा
- अस्ति – है
- सदृशः – समान
- मया – मेरे
- यक्ष्ये – यज्ञ करूँगा
- दास्यामि – दान दूँगा
- मोदिष्ये – आनन्द मनाऊँगा
- इति – इस प्रकार
- अज्ञानविमोहिताः – अज्ञान से पूरी तरह मोहित
अन्वय
(ते चिन्तयन्ति) — आढ्यः अभिजनवान् अस्मि, मया सदृशः अन्यः कः अस्ति? यक्ष्ये, दास्यामि, मोदिष्ये — इति अज्ञानविमोहिताः (ते भवन्ति) ।
व्याख्या
आसुरी व्यक्ति के आत्म-संवाद का यह तीसरा और अन्तिम भाग है। ‘आढ्योऽभिजनवानस्मि’ — ‘मैं धनी हूँ, उच्च कुल का हूँ।’ यहाँ धन और जन्म का अभिमान है। ‘अभिजन’ का अर्थ कुलीनता के साथ-साथ बड़ा परिवार और अनुयायियों का समूह भी है। ‘कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’ — ‘मेरे समान और कौन है?’ यह तुलना और श्रेष्ठता की भावना की चरम सीमा है।
सबसे सूक्ष्म बात अगले शब्दों में है — ‘यक्ष्ये दास्यामि’ — ‘मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा।’ आश्चर्य होता है कि आसुरी व्यक्ति भी यज्ञ और दान की बात करता है! पर इसका उद्देश्य धर्म नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा है — ‘मैं इतना बड़ा यज्ञ करूँगा कि सब देखते रह जाएँ, इतना दान दूँगा कि मेरा नाम हो।’ उसका धर्म भी अहंकार की सेवा में लगा होता है। अगले श्लोक 17 में इसी ‘नामयज्ञ’ की बात और स्पष्ट होती है।
‘मोदिष्ये’ — ‘मैं आनन्द मनाऊँगा।’ यज्ञ और दान का उद्देश्य भी अन्ततः अपना आनन्द और यश ही है।
‘इत्यज्ञानविमोहिताः’ — भगवान् इस पूरे आत्म-संवाद (श्लोक 13–15) का निष्कर्ष एक शब्द में देते हैं: ये सब ‘अज्ञान से मोहित’ हैं। धन, कुल, शक्ति और दिखावटी धर्म — इन सबके बीच वे यह भूल जाते हैं कि ये सब नाशवान् हैं, और जो अहंकार इन्हें पकड़े हुए है, वही उनके दुःख का मूल है।
प्रसंग
पिछले दो श्लोकों में आसुरी व्यक्ति के धन और सत्ता सम्बन्धी विचार बताए गए; यह श्लोक उसके कुल और दिखावटी धर्म के अभिमान को बताकर आत्म-संवाद पूरा करता है। अगले श्लोक में इस मोह का परिणाम — नरक में पतन — बताया गया है।
जीवन-शिक्षा
धर्म और दान भी यदि प्रतिष्ठा के लिए किए जाएँ, तो अहंकार ही बढ़ाते हैं। अच्छे कर्म चुपचाप, बिना दिखावे के और बिना तुलना के करें — यही उनकी सच्ची पवित्रता है।
मुख्य शब्द
- आढ्य
- धनवान्
- अभिजनवान्
- उच्च कुल और बड़े परिवार-समूह वाला
- अज्ञानविमोहित
- अज्ञान से पूरी तरह भ्रमित
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 16.10 – काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः
- गीता 16.11 – चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः
- गीता 16.12 – आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः
- गीता 16.13 – इदमद्य मया लब्धमिमं
- गीता 16.14 – असौ मया हतः
- गीता 16.16 – अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः
- गीता 16.17 – आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः
- गीता 16.18 – अहंकारं बलं दर्पं
- गीता 16.19 – तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु
- गीता 16.20 – आसुरीं योनिमापन्ना मूढा