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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 12

अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग · वक्ता: श्रीकृष्ण

संस्कृत श्लोक

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā .
rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ॥

अर्थ

हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति (निरन्तर क्रियाशीलता), कर्मों का (सकाम) आरम्भ, अशान्ति और लालसा — ये उत्पन्न होते हैं

शब्दार्थ

  • लोभः – लोभ, अधिक पाने की इच्छा
  • प्रवृत्तिः – निरन्तर क्रियाशीलता, बाहरी चेष्टा
  • आरम्भः – आरम्भ, नए उद्यम शुरू करना
  • कर्मणाम् – कर्मों का
  • अशमः – अशान्ति, बेचैनी
  • स्पृहा – लालसा, तीव्र इच्छा
  • रजसि – रजोगुण के
  • एतानि – ये सब
  • जायन्ते – उत्पन्न होते हैं
  • विवृद्धे – बढ़ने पर
  • भरतर्षभ – हे भरतवंश में श्रेष्ठ अर्जुन

अन्वय

भरतर्षभ, रजसि विवृद्धे लोभः प्रवृत्तिः कर्मणाम् आरम्भः अशमः स्पृहा (च) एतानि जायन्ते ।

व्याख्या

अब भगवान् रजोगुण के बढ़ने के पाँच लक्षण बताते हैं। पहला है ‘लोभ’ — जो है उससे सन्तोष न होना और और अधिक पाने की इच्छा। आचार्य शंकर इसे दूसरे के धन को अपनाने की इच्छा भी कहते हैं। दूसरा है ‘प्रवृत्ति’ — मन और शरीर की निरन्तर बहिर्मुखी हलचल, कुछ न कुछ करते रहने की बेचैनी।

तीसरा है ‘कर्मणाम् आरम्भः’ — नए-नए कामों और योजनाओं का आरम्भ करना, विशेषकर फल की कामना से। रजोगुणी व्यक्ति एक काम पूरा होने से पहले ही दूसरे की योजना बना लेता है। चौथा है ‘अशम’ — मन की अशान्ति; ‘यह करूँ, फिर वह करूँ’ की धारा कभी थमती नहीं। पाँचवाँ है ‘स्पृहा’ — हर देखी-सुनी वस्तु के प्रति लालसा।

ध्यान दें कि ये सभी लक्षण आपस में जुड़े हुए हैं। लोभ से प्रवृत्ति होती है, प्रवृत्ति से नए आरम्भ, आरम्भ से अशान्ति, और अशान्ति से नई लालसाएँ। यह एक चक्र है जो व्यक्ति को निरन्तर दौड़ाता रहता है।

आधुनिक जीवन में ये लक्षण अत्यन्त परिचित हैं — अधिक कमाने की होड़, सोशल मीडिया पर दूसरों की वस्तुएँ देखकर लालसा, एक साथ अनेक काम, और फिर भी मन में असन्तोष। इन लक्षणों को पहचानकर हम अपने भीतर रज की मात्रा जान सकते हैं और सन्तोष, संयम तथा निष्काम कर्म से उसे संतुलित कर सकते हैं।

प्रसंग

पिछले श्लोक में सत्त्व-वृद्धि के लक्षण बताए गए; यहाँ रजोगुण की वृद्धि के लक्षण हैं। अगले श्लोक में तमोगुण के बढ़ने के लक्षण बताए जाएँगे।

जीवन-शिक्षा

जब मन में लोभ, बेचैनी और नई-नई लालसाएँ उठें, तो पहचानें कि रज बढ़ा है। ऐसे समय रुककर, सन्तोष और संयम का अभ्यास करें।

मुख्य शब्द

लोभ
अधिक पाने की इच्छा, असन्तोष
अशम
मन की अशान्ति
स्पृहा
विषयों के प्रति लालसा

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