श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 42
अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
yaccāvahāsārthamasatkṛto.asi vihāraśayyāsanabhojaneṣu .
eko.athavāpyacyuta tatsamakṣaṃ tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam ॥
अर्थ
और हे अच्युत! हँसी-विनोद में, घूमते, सोते, बैठते या भोजन करते समय, अकेले में अथवा दूसरों के सामने भी, मैंने जो आपका अनादर किया है, उन सबके लिए मैं अप्रमेय स्वरूप आपसे क्षमा माँगता हूँ
शब्दार्थ
- यत् – जो
- च – और
- अवहासार्थम् – हँसी-मजाक के लिए
- असत्कृतः – अनादर किए गए
- असि – हैं
- विहार – घूमना, क्रीड़ा
- शय्या – शयन
- आसन – बैठना
- भोजनेषु – और भोजन के समयों में
- एकः – अकेले
- अथवा अपि – या फिर
- अच्युत – हे अच्युत, कभी च्युत न होने वाले
- तत्समक्षम् – उन (दूसरों) के सामने
- तत् – उस सबके लिए
- क्षामये – क्षमा माँगता हूँ
- त्वाम् – आपसे
- अहम् – मैं
- अप्रमेयम् – जिनका माप न हो सके, अप्रमेय
अन्वय
अच्युत, यत् च अवहासार्थम् विहारशय्यासनभोजनेषु एकः अथवा अपि तत्समक्षम् (मया) असत्कृतः असि, तत् (सर्वम्) अप्रमेयम् त्वाम् अहम् क्षामये ।
व्याख्या
पिछले श्लोक का वाक्य यहाँ पूरा होता है। अर्जुन अपने उन सब क्षणों को याद करता है जब मित्रता की सहजता में उसने कृष्ण से विनोद किया — ‘विहार’ अर्थात् घूमने-खेलने में, ‘शय्या’ अर्थात् विश्राम के समय, ‘आसन’ पर साथ बैठते हुए और ‘भोजन’ के समय। ये चारों दैनिक जीवन के सबसे घनिष्ठ प्रसंग हैं, जहाँ मित्र एक-दूसरे से कोई दूरी नहीं रखते।
‘एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षम्’ — अकेले में अथवा दूसरों के सामने। अकेले में किया गया विनोद भी अर्जुन को अब अपराध लगता है, और दूसरों के सामने किया गया तो और भी। ‘अवहासार्थम्’ बताता है कि उद्देश्य अपमान नहीं, केवल हँसी था; फिर भी परम पुरुष के प्रति वह अनुचित था — यही अर्जुन का भाव है।
दो सम्बोधन ध्यान देने योग्य हैं। ‘अच्युत’ — जो कभी अपनी महिमा से च्युत नहीं होते; मनुष्य रूप में मित्र बनकर रहते हुए भी उनका स्वरूप कभी घटा नहीं। ‘अप्रमेय’ — जिन्हें किसी प्रमाण से मापा नहीं जा सकता; अर्जुन मानो कहता है कि मैंने आपको अपनी छोटी बुद्धि के माप में बाँध लिया था। शंकराचार्य ‘अप्रमेय’ को प्रमाणों की पहुँच से परे होने के अर्थ में लेते हैं।
रामानुजाचार्य इस प्रसंग में भगवान् के वात्सल्य और सौशील्य गुणों की ओर संकेत करते हैं — परम ईश्वर होकर भी वे छोटे के साथ बराबरी से मिलते हैं और उसके दोषों को देखते तक नहीं। अर्जुन की क्षमा-याचना इसलिए भय से नहीं, प्रेम से भरी हुई विनम्रता से निकली है।
प्रसंग
यह श्लोक 11.41 के वाक्य को पूरा करता है, जिसमें अर्जुन ने अपने अनजाने व्यवहार का उल्लेख किया था। अगले श्लोक (11.43) में वह भगवान् को चराचर का पिता और परम गुरु कहकर अपनी याचना का आधार बताता है।
जीवन-शिक्षा
छोटी-छोटी असावधानियाँ भी, जब महान् के प्रति हों, खेद योग्य हैं। अपनी भूल को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर क्षमा माँगना, सम्बन्ध को टूटने नहीं देता, बल्कि और गहरा करता है।
मुख्य शब्द
- अच्युत
- जो अपनी महिमा से कभी नहीं गिरते
- अप्रमेय
- जिनका प्रमाणों से माप न हो सके
- अवहास
- हँसी, विनोद
- क्षामये
- क्षमा की याचना करता हूँ
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 11.37 – कस्माच्च ते न
- गीता 11.38 – त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्-
- गीता 11.39 – वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
- गीता 11.40 – नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
- गीता 11.41 – सखेति मत्वा प्रसभं
- गीता 11.43 – पितासि लोकस्य चराचरस्य
- गीता 11.44 – तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
- गीता 11.45 – अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
- गीता 11.46 – किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तं
- गीता 11.47 – श्रीभगवानुवाच