भगवद् गीता वर्ल्ड

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 29

अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग · वक्ता: अर्जुन

संस्कृत श्लोक

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्-
तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ .
tathaiva nāśāya viśanti lokāsa- tavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ ॥

अर्थ

जैसे पतंगे अपने ही विनाश के लिए अत्यन्त वेग से जलती हुई अग्नि में कूद पड़ते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए बड़े वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं

शब्दार्थ

  • यथा – जैसे
  • प्रदीप्तम् – प्रज्वलित, धधकती हुई
  • ज्वलनम् – अग्नि में
  • पतङ्गाः – पतंगे, कीट
  • विशन्ति – प्रवेश करते हैं
  • नाशाय – नाश के लिए
  • समृद्धवेगाः – अत्यन्त वेग से युक्त
  • तथा एव – वैसे ही
  • लोकाः – लोग, प्राणी
  • तव – आपके
  • अपि – भी
  • वक्त्राणि – मुखों में

अन्वय

यथा पतङ्गाः समृद्धवेगाः नाशाय प्रदीप्तम् ज्वलनम् विशन्ति, तथा एव लोकाः अपि समृद्धवेगाः नाशाय तव वक्त्राणि विशन्ति ।

व्याख्या

पिछले श्लोक में नदियों की उपमा थी; यहाँ अर्जुन दूसरी उपमा देता है — दीपक की लौ में कूदते पतंगे। दोनों उपमाओं में एक सूक्ष्म भेद है। नदी में कोई इच्छा नहीं, वह केवल प्रकृति के नियम से समुद्र की ओर बहती है। पतंगा अपनी इच्छा से, आकर्षण से खिंचकर, उसी अग्नि में कूदता है जो उसे भस्म कर देगी। ‘नाशाय’ शब्द दो बार आया है — वे जानबूझकर नहीं, पर अपने ही मोह से, अपने विनाश की ओर दौड़ रहे हैं।

शंकराचार्य संकेत करते हैं कि पहली उपमा उन प्राणियों के लिए है जो विवश होकर काल में प्रवेश करते हैं, और दूसरी उन के लिए जो अविवेक से, आसक्ति से प्रेरित होकर स्वयं विनाश की ओर भागते हैं। दुर्योधन और उसके साथियों का युद्ध की ओर बढ़ना ठीक यही है — लोभ, अहंकार और राज्य की तृष्णा उन्हें उसी अग्नि की ओर खींच रही है जिसमें उनका अन्त निश्चित है। ‘समृद्धवेगाः’ — अत्यन्त वेग से — यह बताता है कि आसक्त मन विनाश की ओर धीरे नहीं, उत्साह से दौड़ता है।

यह चित्र केवल कुरुक्षेत्र का नहीं, हर युग के मनुष्य का है। इन्द्रियों के विषय दीपशिखा की तरह चमकते हैं; मन पतंगे की तरह उनकी ओर खिंचता है और अन्त में दुःख ही पाता है। गीता (2.62–63) में बताई गई शृंखला — विषय-चिन्तन से संग, संग से काम, काम से क्रोध और अन्त में बुद्धिनाश — इसी पतंग-वृत्ति का विस्तार है। विश्वरूप में अर्जुन देख रहा है कि यह सारा आकर्षण और विनाश भी अन्ततः भगवान् के ही विराट् विधान के भीतर घट रहा है।

प्रसंग

श्लोक 28 की नदी-उपमा के बाद अर्जुन इसी दृश्य के लिए दूसरी उपमा देता है। अगले श्लोक में वह भगवान् को सब लोकों को निगलते और अपने तेज से जगत् को तपाते हुए वर्णन करेगा, और फिर श्लोक 31 में पूछेगा कि यह उग्ररूप कौन है।

जीवन-शिक्षा

जिस चमक की ओर हम बिना विचारे दौड़ते हैं, वह कई बार हमें जलाने वाली अग्नि होती है। विवेक का अर्थ है आकर्षण के क्षण में रुककर देखना कि यह मार्ग कहाँ ले जाता है।

मुख्य शब्द

पतङ्ग
पतंगा — आसक्ति से विनाश की ओर दौड़ने वाले जीव का प्रतीक
समृद्धवेग
अत्यधिक वेग से युक्त
नाशाय
विनाश के लिए — अपनी ही हानि की ओर

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