श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 2
अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग · वक्ता: अर्जुन
संस्कृत श्लोक
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā .
tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam ॥
अर्थ
हे कमलनयन! मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय का विस्तार से वर्णन सुना है, और आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है
शब्दार्थ
- भवाप्ययौ – उत्पत्ति और प्रलय (दोनों)
- हि – निश्चय ही
- भूतानाम् – प्राणियों के, भूतों के
- श्रुतौ – सुने गए
- विस्तरशः – विस्तारपूर्वक
- मया – मेरे द्वारा
- त्वत्तः – आपसे
- कमलपत्राक्ष – हे कमल-पत्र जैसे नेत्रों वाले
- माहात्म्यम् – महिमा, माहात्म्य
- अपि – भी
- च – और
- अव्ययम् – अविनाशी, कभी न घटने वाला
अन्वय
हे कमल-पत्र-अक्ष, भूतानाम् भव-अप्ययौ हि मया त्वत्तः विस्तरशः श्रुतौ, अव्ययम् माहात्म्यम् अपि च (श्रुतम्) ।
व्याख्या
अर्जुन यहाँ संक्षेप में बताते हैं कि उन्होंने अब तक क्या सुना है। ‘भवाप्ययौ’ — सृष्टि और प्रलय — का वर्णन सातवें से दसवें अध्याय तक बार-बार आया: ‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा’ (7.6), ‘भूतग्रामम् इमं कृत्स्नम्… विसृजामि’ (9.8) आदि। जगत् भगवान् से निकलता है और उन्हीं में लीन होता है; वे इसके उपादान और निमित्त दोनों कारण हैं।
पर अर्जुन केवल सृष्टि-विज्ञान नहीं सुनना चाहते थे; उन्होंने भगवान् का ‘अव्यय माहात्म्य’ भी सुना — वह महिमा जो सृष्टि के बनने-बिगड़ने से अप्रभावित रहती है। जगत् परिवर्तनशील है, पर उसका आधार अपरिवर्तनशील है। शंकराचार्य बताते हैं कि यह माहात्म्य ईश्वर का वह स्वरूप है जो सब कर्मों के फल देने वाला होकर भी स्वयं निर्लिप्त रहता है। रामानुज इसे भगवान् के अनन्त कल्याण-गुणों, जैसे सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता और करुणा के रूप में देखते हैं, जो कभी क्षीण नहीं होते।
‘कमलपत्राक्ष’ सम्बोधन बहुत मधुर है। जिस ब्रह्म के विराट् ऐश्वर्य की बात हो रही है, उसी को अर्जुन प्रेम से ‘कमल-नयन’ कहते हैं। यह भक्ति और ज्ञान का सुन्दर मेल है — ऐश्वर्य की चर्चा के बीच भी माधुर्य का भाव बना रहता है। कमल जल में रहकर भी भीगता नहीं; वैसे ही भगवान् जगत् के कारण होते हुए भी उससे अलिप्त हैं।
प्रसंग
पहले श्लोक में कृतज्ञता प्रकट करने के बाद अर्जुन यहाँ बताते हैं कि उन्होंने क्या-क्या सुना है। यह तीसरे श्लोक की प्रार्थना की पृष्ठभूमि है — सुनी हुई बातों को अब वे अपनी आँखों से देखना चाहते हैं।
जीवन-शिक्षा
संसार के बनने-बिगड़ने के बीच एक अविनाशी आधार है; उसी पर दृष्टि टिकाने से जीवन के उतार-चढ़ाव में स्थिरता आती है। ईश्वर की महानता को समझते हुए भी उनके प्रति प्रेम और आत्मीयता बनाए रखें।
मुख्य शब्द
- भवाप्यय
- जगत् की उत्पत्ति और लय
- माहात्म्य
- महिमा, प्रभाव और महानता
- अव्यय
- जो कभी न घटे, अविनाशी
- कमलपत्राक्ष
- कमल-पत्र के समान नेत्रों वाले — श्रीकृष्ण का प्रिय नाम
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 11.1 – अर्जुन उवाच
- गीता 11.3 – एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर
- गीता 11.4 – मन्यसे यदि तच्छक्यं
- गीता 11.5 – श्रीभगवानुवाच
- गीता 11.6 – पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा
- गीता 11.7 – इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य
- गीता 11.8 – न तु मां
- गीता 11.9 – सञ्जय उवाच
- गीता 11.10 – अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्
- गीता 11.11 – दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्