श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 38
अध्याय 10 – विभूतियोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
daṇḍo damayatāmasmi nītirasmi jigīṣatām .
maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatāmaham ॥
अर्थ
मैं दमन (शासन) करने वालों का दंड हूँ, विजय चाहने वालों की नीति हूँ, गोपनीय भावों में मौन हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान हूँ
शब्दार्थ
- दण्डः – दंड, दमन की शक्ति
- दमयताम् – दमन (नियंत्रण) करने वालों का
- अस्मि – हूँ
- नीतिः – नीति, न्यायपूर्ण उपाय
- अस्मि – हूँ
- जिगीषताम् – विजय की इच्छा रखने वालों की
- मौनम् – मौन
- च – और
- एव – ही
- अस्मि – हूँ
- गुह्यानाम् – गोपनीय भावों में
- ज्ञानम् – ज्ञान
- ज्ञानवताम् – ज्ञानियों का
- अहम् – मैं
अन्वय
दमयतां दण्डः अस्मि, जिगीषतां नीतिः अस्मि, गुह्यानां च मौनम् एव अस्मि, ज्ञानवतां ज्ञानम् अहम् (अस्मि) ।
व्याख्या
‘दण्डो दमयतामस्मि’ — दमन करने वालों में मैं दंड हूँ। समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए दुष्टों को रोकना आवश्यक है, और इसका साधन है ‘दंड’ — न्यायपूर्ण दंड-विधान। आचार्य शंकर कहते हैं कि जो उच्छृंखल और कुमार्गगामी हैं, उन्हें दंड ही सीधे मार्ग पर लाता है। मनुस्मृति में कहा गया है कि दंड ही प्रजा का शासन और रक्षा करता है। पर यह दंड न्याय से प्रेरित होना चाहिए, क्रोध या प्रतिशोध से नहीं। माता-पिता का अनुशासन भी इसी का रूप है — प्रेमपूर्वक सुधार के लिए।
‘नीतिरस्मि जिगीषताम्’ — विजय चाहने वालों की नीति मैं हूँ। नीति का अर्थ है उचित, न्यायसंगत उपाय और कुशल रणनीति। विजय केवल बल से नहीं, बुद्धिमत्तापूर्ण नीति से मिलती है। आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि यह न्याय पर आधारित नीति है, छल नहीं। श्रीकृष्ण स्वयं महाभारत में नीति के सबसे बड़े आचार्य रहे — उन्होंने शांति के लिए दूत बनकर प्रयास किया, और युद्ध में धर्म की विजय के लिए मार्गदर्शन किया।
‘मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्’ — गोपनीय बातों में मैं मौन हूँ। किसी रहस्य को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा उपाय मौन है — जो बोला ही नहीं गया, वह प्रकट नहीं हो सकता। इसका एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है: परम सत्य शब्दों से परे है, वह मौन में ही अनुभव होता है। उपनिषदों में कहा गया है कि वहाँ से वाणी मन के साथ लौट आती है। दक्षिणामूर्ति शिव मौन व्याख्यान से ही शिष्यों के संशय दूर करते हैं। मुनि वही है जो मौन रहता है।
‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’ — ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ। ज्ञानी के भीतर जो तत्त्व-ज्ञान प्रकाशित होता है, वह भगवान् का ही स्वरूप है। इस प्रकार यह श्लोक शासन, राजनीति, मौन और ज्ञान — इन चारों में भगवान् की उपस्थिति दिखाता है।
प्रसंग
सैंतीसवें श्लोक में वासुदेव, अर्जुन, व्यास और शुक्राचार्य में विभूतियाँ बताई गईं। यहाँ दंड, नीति, मौन और ज्ञान में बताई गई हैं। अगले श्लोक में भगवान् बताएँगे कि वे सब प्राणियों के बीज हैं और चर-अचर में कुछ भी उनके बिना नहीं है।
जीवन-शिक्षा
अनुशासन और न्याय समाज के लिए आवश्यक हैं, पर उन्हें प्रेम और निष्पक्षता से प्रेरित होना चाहिए। सफलता के लिए न्यायपूर्ण नीति अपनाएँ। मौन की शक्ति को पहचानें — कम बोलें, अधिक सुनें और भीतर के मौन में भगवान् का अनुभव करें।
मुख्य शब्द
- दंड
- न्यायपूर्ण दंड-विधान, अनुशासन की शक्ति
- नीति
- न्यायसंगत उपाय, कुशल रणनीति
- मौन
- चुप रहना, रहस्य की रक्षा, परम सत्य का अनुभव
- जिगीषा
- विजय की इच्छा
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 10.33 – अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य
- गीता 10.34 – मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्
- गीता 10.35 – बृहत्साम तथा साम्नां
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- गीता 10.40 – नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां
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- गीता 10.42 – अथवा बहुनैतेन किं