श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 23
अध्याय 10 – विभूतियोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
rudrāṇāṃ śaṅkaraścāsmi vitteśo yakṣarakṣasām .
vasūnāṃ pāvakaścāsmi meruḥ śikhariṇāmaham ॥
अर्थ
मैं ग्यारह रुद्रों में शंकर हूँ, यक्षों और राक्षसों में धन के स्वामी कुबेर हूँ, आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ
शब्दार्थ
- रुद्राणाम् – रुद्रों में
- शङ्करः – शंकर (कल्याण करने वाले शिव)
- च – और
- अस्मि – हूँ
- वित्तेशः – धन के स्वामी — कुबेर
- यक्षरक्षसाम् – यक्षों और राक्षसों में
- वसूनाम् – वसुओं में
- पावकः – पावक, अग्नि
- च – और
- अस्मि – हूँ
- मेरुः – मेरु पर्वत
- शिखरिणाम् – शिखर वाले पर्वतों में
- अहम् – मैं
अन्वय
रुद्राणां शङ्करः च अस्मि, यक्षरक्षसां वित्तेशः (अस्मि), वसूनां पावकः च अस्मि, शिखरिणाम् अहं मेरुः (अस्मि) ।
व्याख्या
‘रुद्राणां शङ्करश्चास्मि’ — रुद्रों में मैं शंकर हूँ। पुराणों में ग्यारह रुद्र बताए गए हैं, जो संहार और परिवर्तन की शक्तियाँ हैं। इनमें शंकर प्रमुख हैं। ‘शंकर’ का अर्थ है — ‘शं’ (कल्याण) ‘करोति’ (करते हैं) — जो कल्याण करते हैं। रुद्र रूप भयंकर दिखता है, पर उसके भीतर शंकर का कल्याणकारी स्वरूप छिपा है। संहार भी नई सृष्टि का मार्ग खोलता है, इसलिए वह भी अंततः कल्याणकारी है। यह विभूति शैव और वैष्णव परंपराओं की एकता का भी संकेत करती है।
‘वित्तेशो यक्षरक्षसाम्’ — यक्षों और राक्षसों में मैं वित्तेश (कुबेर) हूँ। कुबेर धन के देवता और यक्षों के राजा हैं, जिनकी राजधानी अलकापुरी है। वे रावण के सौतेले भाई थे, पर रावण के विपरीत धर्मनिष्ठ रहे और भगवान् शिव के मित्र माने जाते हैं। यक्ष-राक्षस प्रायः धन और शक्ति के लोभी माने जाते हैं, पर उनमें कुबेर धन के धर्मपूर्ण संरक्षक हैं — यही उनकी विशेषता है।
‘वसूनां पावकश्चास्मि’ — आठ वसुओं में मैं पावक (अग्नि) हूँ। आठ वसु हैं — धरा (पृथ्वी), अनल (अग्नि), अप् (जल), अनिल (वायु), ध्रुव, सोम, प्रत्यूष और प्रभास। अग्नि को ‘पावक’ कहते हैं क्योंकि वह पवित्र करती है — जो कुछ उसमें डाला जाए, उसे शुद्ध कर देती है। यज्ञ में देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाली भी अग्नि ही है।
‘मेरुः शिखरिणामहम्’ — शिखरों वाले पर्वतों में मैं मेरु हूँ। पौराणिक भूगोल में मेरु (सुमेरु) ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित स्वर्णमय पर्वत है, जिसके चारों ओर सूर्य, चंद्र और ग्रह परिक्रमा करते हैं और जिस पर देवताओं के लोक हैं। वह स्थिरता, ऊँचाई और केंद्रीयता का प्रतीक है — जैसे भगवान् सारे जगत् के अचल केंद्र हैं।
प्रसंग
बाईसवें श्लोक में वेद, देवता, इंद्रिय और चेतना में विभूतियाँ बताई गईं। यहाँ रुद्र, यक्ष-राक्षस, वसु और पर्वतों में बताई गई हैं। अगले श्लोक में भगवान् पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र के रूप में अपनी विभूति बताएँगे।
जीवन-शिक्षा
जो कठोर या भयंकर दिखता है, उसमें भी कल्याण छिपा हो सकता है — जैसे रुद्र में शंकर। धन का धर्मपूर्ण उपयोग करें, जैसे कुबेर करते हैं। अग्नि की तरह अपने संपर्क में आने वाली हर चीज़ को पवित्र करें, और मेरु की तरह अपने मूल्यों में अचल रहें।
मुख्य शब्द
- रुद्र
- ग्यारह संहार-शक्ति देवता
- शंकर
- कल्याण करने वाले — शिव
- कुबेर (वित्तेश)
- धन के स्वामी, यक्षों के राजा
- वसु
- आठ देवता — पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु आदि
- मेरु
- ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित स्वर्णमय पर्वत
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 10.18 – विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं
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