श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 11
अध्याय 10 – विभूतियोग · वक्ता: श्रीकृष्ण
संस्कृत श्लोक
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ .
nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā ॥
अर्थ
उन भक्तों पर कृपा करने के लिए ही मैं उनके हृदय में स्थित होकर प्रकाशमान ज्ञान-रूपी दीपक से उनके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर देता हूँ
शब्दार्थ
- तेषाम् – उन (भक्तों) पर
- एव – ही
- अनुकम्पार्थम् – कृपा (करुणा) करने के लिए
- अहम् – मैं
- अज्ञानजम् – अज्ञान से उत्पन्न
- तमः – अंधकार
- नाशयामि – नष्ट करता हूँ
- आत्मभावस्थः – उनके अंतःकरण (हृदय) में स्थित होकर
- ज्ञानदीपेन – ज्ञान-रूपी दीपक से
- भास्वता – प्रकाशमान
अन्वय
तेषाम् एव अनुकम्पार्थम् अहम् आत्मभावस्थः (सन्) भास्वता ज्ञानदीपेन अज्ञानजं तमः नाशयामि ।
व्याख्या
चतुःश्लोकी का चौथा और अंतिम श्लोक भगवान् की करुणा का चरम है। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि वे प्रेमी भक्तों को बुद्धियोग देते हैं। अब वे बताते हैं कि यह कैसे होता है और क्यों होता है।
‘तेषामेवानुकम्पार्थम्’ — उन्हीं पर अनुकंपा के लिए। ‘एव’ (ही) शब्द महत्त्वपूर्ण है: भगवान् का यह कार्य किसी अपने लाभ के लिए नहीं, केवल भक्तों पर करुणा के कारण है। अनुकंपा का अर्थ है दूसरे के दुःख को देखकर द्रवित होना। भगवान् भक्त के अज्ञान-जनित कष्ट को देखकर स्वयं आगे बढ़ते हैं।
‘आत्मभावस्थः’ — उनके अंतःकरण में स्थित होकर। भगवान् बाहर से उपदेश देने वाले गुरु की तरह ही नहीं, बल्कि भीतर बैठे अंतर्यामी के रूप में कार्य करते हैं। आचार्य शंकर इसका अर्थ करते हैं — भक्तों के अंतःकरण की वृत्तियों में स्थित होकर। जब भक्त का हृदय शुद्ध हो जाता है, तो भीतर का भगवान् स्वयं प्रकाशित होने लगता है।
‘ज्ञानदीपेन भास्वता’ — प्रकाशमान ज्ञान-दीप से। आचार्य शंकर ने इस दीपक का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है: इस दीपक का तेल भक्ति-रूपी प्रसाद (कृपा) है, इसकी वायु से रक्षा भगवान् के ध्यान की भावना करती है, इसकी बत्ती सम्यक् दर्शन (सही समझ) है, जो ब्रह्मचर्य आदि साधनों से संस्कारित है, इसका आधार राग-द्वेष से रहित अंतःकरण है, और यह वैराग्य रूपी हवा-रहित स्थान में रखा है जहाँ यह स्थिर जलता है। ऐसा दीपक जब जलता है तो ‘अज्ञानजं तमः’ — अज्ञान से उत्पन्न अंधकार — तुरंत मिट जाता है।
अंधकार को डंडे से भगाया नहीं जा सकता; केवल दीपक जलाने से वह स्वयं चला जाता है। इसी प्रकार अज्ञान को तर्क या बल से नहीं, भगवान् की कृपा से जगे ज्ञान से ही दूर किया जाता है। हज़ारों वर्षों से अंधेरी गुफा भी एक दीपक से क्षण भर में प्रकाशित हो जाती है — जन्मों का अज्ञान भी भगवान् के ज्ञान-दीप से क्षण में मिट सकता है।
प्रसंग
दसवें श्लोक में भगवान् ने भक्तों को बुद्धियोग देने की बात कही। यहाँ चतुःश्लोकी पूर्ण होती है — भगवान् भक्तों के हृदय में ज्ञान-दीप जलाते हैं। अगले श्लोक से अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए उनसे विभूतियों का विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना करेंगे।
जीवन-शिक्षा
हमारे भीतर का अंधकार — भ्रम, भय, अज्ञान — बाहरी प्रयासों से नहीं, भगवान् की कृपा से जलने वाले ज्ञान-दीप से मिटता है। उस दीपक के लिए हृदय को राग-द्वेष से शुद्ध और भक्ति से भरा रखें।
मुख्य शब्द
- अनुकम्पा
- करुणा, दूसरे के दुःख से द्रवित होना
- आत्मभावस्थ
- भक्त के अंतःकरण में स्थित
- ज्ञानदीप
- ज्ञान-रूपी दीपक
- अज्ञानज तम
- अज्ञान से उत्पन्न अंधकार
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 10.6 – महर्षयः सप्त पूर्वे
- गीता 10.7 – एतां विभूतिं योगं
- गीता 10.8 – अहं सर्वस्य प्रभवो
- गीता 10.9 – मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः
- गीता 10.10 – तेषां सततयुक्तानां भजतां
- गीता 10.12 – अर्जुन उवाच
- गीता 10.13 – आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा
- गीता 10.14 – सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां
- गीता 10.15 – स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं
- गीता 10.16 – वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः