श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 9
अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: संजय
संस्कृत श्लोक
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)
anye ca bahavaḥ śūrā madarthe tyaktajīvitāḥ .
nānāśastrapraharaṇāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ ॥
अर्थ
इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीवन का मोह त्याग दिया है; वे सब अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित और युद्ध-कला में निपुण हैं
शब्दार्थ
- अन्ये – दूसरे
- च – और
- बहवः – बहुत-से
- शूराः – शूरवीर
- मदर्थे – मेरे लिए
- त्यक्तजीविताः – जीवन की आशा त्याग देने वाले
- नानाशस्त्रप्रहरणाः – अनेक प्रकार के शस्त्र-अस्त्र धारण करने वाले
- सर्वे – सभी
- युद्धविशारदाः – युद्ध-कला में निपुण
अन्वय
अन्ये च बहवः शूराः मदर्थे त्यक्तजीविताः, नानाशस्त्रप्रहरणाः, सर्वे युद्धविशारदाः (सन्ति) ।
व्याख्या
प्रमुख नायकों के नाम लेने के बाद दुर्योधन शेष योद्धाओं का सामूहिक उल्लेख करता है। उसकी सेना में शल्य, जयद्रथ, भगदत्त, कृतवर्मा, शकुनि, सुशर्मा जैसे अनेक प्रसिद्ध राजा और वीर थे। उन सबके नाम गिनाने के बजाय वह कहता है कि ये सब 'मेरे लिए' प्राण देने को तैयार हैं।
'मदर्थे' — मेरे लिए — शब्द दुर्योधन के अहंकार का स्पष्ट चित्र है। वह इस युद्ध को धर्म या राज्य के लिए नहीं, अपने लिए लड़ा जाने वाला युद्ध मानता है। सारी सेना उसके व्यक्तिगत हित का साधन है। इसके विपरीत, आगे चलकर अर्जुन कहेगा कि जिनके लिए राज्य और सुख चाहिए, वे ही यहाँ प्राण त्यागने को खड़े हैं (1.33) — दोनों की दृष्टि में कितना अन्तर है!
'त्यक्तजीविताः' का शाब्दिक अर्थ है 'जिन्होंने जीवन त्याग दिया है'। व्याख्याकार इसमें एक अनजाना सत्य भी देखते हैं — दुर्योधन अनजाने में ही भविष्यवाणी कर रहा है कि उसके पक्ष के ये वीर सचमुच प्राण गँवाने वाले हैं। अधर्मी की वाणी में भी कभी-कभी नियति बोल उठती है।
'नानाशस्त्रप्रहरणाः' और 'युद्धविशारदाः' कहकर वह अपनी सेना की तकनीकी श्रेष्ठता पर बल देता है। परन्तु शस्त्रों और कौशल की प्रचुरता भी उस आन्तरिक बल की पूर्ति नहीं कर सकती जो धर्म के पक्ष में खड़े होने से मिलता है।
प्रसंग
श्लोक 8 में प्रमुख नायकों के नाम लेने के बाद दुर्योधन यहाँ अन्य वीरों का सामूहिक वर्णन करता है। अगले श्लोक में वह दोनों सेनाओं की तुलना करता है।
जीवन-शिक्षा
जो व्यक्ति सबको केवल अपने स्वार्थ का साधन मानता है, वह अन्ततः अकेला रह जाता है। नेतृत्व का अर्थ दूसरों से अपने लिए बलिदान माँगना नहीं, बल्कि सबके हित के लिए स्वयं को समर्पित करना है।
मुख्य शब्द
- मदर्थे
- मेरे लिए; दुर्योधन के स्वार्थ और अहंकार का सूचक
- त्यक्तजीवित
- जिसने जीवन का मोह छोड़ दिया हो
- युद्धविशारद
- युद्ध-विद्या में पारंगत
इसी अध्याय के निकटवर्ती श्लोक
- गीता 1.4 – अत्र शूरा महेष्वासा
- गीता 1.5 – धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्
- गीता 1.6 – युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च
- गीता 1.7 – अस्माकं तु विशिष्टा
- गीता 1.8 – भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च
- गीता 1.10 – अपर्याप्तं तदस्माकं बलं
- गीता 1.11 – अयनेषु च सर्वेषु
- गीता 1.12 – तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः
- गीता 1.13 – ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च
- गीता 1.14 – ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति