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श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 22

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग · वक्ता: अर्जुन

संस्कृत श्लोक

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥

उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण)

yāvadetānnirikṣe.ahaṃ yoddhukāmānavasthitān .
kairmayā saha yoddhavyamasmin raṇasamudyame ॥

अर्थ

जिससे मैं युद्ध की इच्छा से यहाँ खड़े इन योद्धाओं को भली-भाँति देख सकूँ कि इस युद्ध के आयोजन में मुझे किन-किनके साथ लड़ना है

शब्दार्थ

  • यावत् – जब तक, जिससे
  • एतान् – इन सबको
  • निरीक्षे – भली-भाँति देख लूँ
  • अहम् – मैं
  • योद्धुकामान् – युद्ध की इच्छा रखने वालों को
  • अवस्थितान् – खड़े हुए
  • कैः – किन-किनके
  • मया – मेरे द्वारा
  • सह – साथ
  • योद्धव्यम् – युद्ध किया जाना है
  • अस्मिन् – इस
  • रणसमुद्यमे – युद्ध के उद्यम में, युद्ध की तैयारी में

अन्वय

यावत् अहम् एतान् योद्धुकामान् अवस्थितान् निरीक्षे, अस्मिन् रणसमुद्यमे मया कैः सह योद्धव्यम् (इति) ।

व्याख्या

अर्जुन अपने अनुरोध का कारण बताते हैं। वे एक कुशल योद्धा की तरह शत्रु-पक्ष का निरीक्षण करना चाहते हैं — कौन-कौन से योद्धा सामने हैं, किस-किससे उनका सामना होगा। 'निरीक्षे' शब्द का अर्थ केवल देखना नहीं, ध्यानपूर्वक परखना है। युद्ध-नीति में यह स्वाभाविक भी है कि आरम्भ से पहले योद्धा प्रतिपक्ष की शक्ति और रचना को भली-भाँति समझ ले।

'योद्धुकामान्' — युद्ध की कामना वाले — शब्द में अर्जुन की एक दृढ़ धारणा झलकती है। वह मानता है कि युद्ध की इच्छा कौरवों की है, पाण्डवों की नहीं। पाण्डवों ने तो शान्ति का हर सम्भव प्रयास किया था; स्वयं श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे, परन्तु दुर्योधन ने उन्हें भी बन्दी बनाने का प्रयास किया। इसलिए अर्जुन के मन में यह स्पष्ट है कि युद्ध उन पर थोपा गया है।

'कैर्मया सह योद्धव्यम्' — 'मुझे किनसे लड़ना है' — यह प्रश्न सामान्य लगता है, पर इसमें आगे के पूरे विषाद का बीज छिपा है। जब अर्जुन इसका उत्तर अपनी आँखों से देखेंगे, तब पाएँगे कि सामने कोई अपरिचित शत्रु नहीं, बल्कि उनके पितामह, गुरु, भाई और सम्बन्धी हैं। वही दृश्य उनके हृदय को झकझोर देगा।

इस समय तक अर्जुन का स्वर आत्मविश्वासपूर्ण है। वे स्वयं को 'अहम्' — 'मैं' — कहकर कर्ता के रूप में देख रहे हैं; यही कर्तापन का भाव आगे मोह का आधार बनता है।

प्रसंग

श्लोक 21 में अर्जुन ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने को कहा था; यहाँ और अगले श्लोक में वे इसका कारण बताते हैं।

जीवन-शिक्षा

कोई भी संघर्ष आरम्भ करने से पहले यह स्पष्ट देख लेना चाहिए कि उसमें कौन-कौन जुड़ा है और उसका प्रभाव किन पर पड़ेगा। स्पष्ट दृष्टि ही सही निर्णय की नींव है।

मुख्य शब्द

निरीक्षण
ध्यानपूर्वक देखना और परखना
योद्धुकाम
युद्ध की इच्छा रखने वाला
रणसमुद्यम
युद्ध का उद्यम, युद्ध की पूर्ण तैयारी

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